भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1302

वह अपनी छातीपर सुवर्णमय निष्क (पदक) पहनकर अग्निकी माला धारण किये पर्वतके समान प्रतीत होता था। उसके मस्तकपर सोनेका बना हुआ विचित्र उज्ज्वल मुकुट तोरणके समान सुशोभित हो रहा था। उस मुकुटकी विविध अंगोंसे बड़ी शोभा हो रही थी ।। ९ १/२ ।।

कुण्डले बालसूर्याभे मालां हेममयीं शुभाम् ।। १० ।।
धारयन् विपुलं कांस्यं कवचं च महाप्रभम् ।
वह प्रभातकालके सूर्यकी भाँति कान्तिमान् दो कुण्डल, सोनेकी सुन्दर माला और काँसीका विशाल एवं चमकीला कवच धारण किये हुए था ।। १० १/२ ।।

किंकिणीशतनिर्घोषं रक्तध्वजपताकिनम् ।। ११ ।।
ऋक्षचर्मावनद्धाङ्गं नल्वमात्रं महारथम् ।
उसके रथमें सैकड़ों क्षुद्र घण्टिकाओंका मधुर घोष होता था। उसपर लाल रंगकी ध्वजा-पताका फहरा रही थी। उस रथके सम्पूर्ण अंगोंपर रीछकी खाल मढ़ी गयी थी। वह विशाल रथ चारों ओरसे चार सौ हाथ लंबा था ।। ११ १/२ ।।

सर्वायुधवरोपेतमास्थितो ध्वजशालिनम् ।। १२ ।।