भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1304

रश्मिभिः सूर्यरश्म्याभैः संजग्राह हयान् रणे ।
स तेन सहितस्तस्थावरुणेन यथा रविः ॥ १६ ॥
दीप्तिमान् मुख और कुण्डलोंसे युक्त विरूपाक्ष नामक राक्षस घटोत्कचका सारथि था, जो रणभूमिमें सूर्यकी किरणोंके समान चमकीली बागडोर पकड़कर उन घोड़ोंको काबूमें रखता था। उसके साथ रथपर बैठा हुआ घटोत्कच ऐसा जान पड़ता था, मानो अरुण नामक सारथिके साथ सूर्यदेव अपने रथपर विराजमान हों ॥ १५-१६ ॥

संसक्त इव चाभ्रेण यथाद्रिर्महता महान् ।
दिवःस्पृक् सुमहान् केतुः स्यन्दनेऽस्य समुच्छ्रितः ॥ १७ ॥
रक्तोत्तमाङ्गः क्रव्यादो गृध्रः परमभीषणः ।
जैसे महान् पर्वत किसी महामेघसे संयुक्त हो जाय, उसी प्रकार अपने सारथिके साथ बैठे हुए घटोत्कचकी शोभा हो रही थी। उसके रथपर बहुत ऊँची गगन-चुम्बिनी पताका फहरा रही थी, जिसपर एक लाल सिरवाला अत्यन्त भयंकर मांसभोजी गीध दिखायी देता था ॥ १७ १/२ ॥

वासवाशनिनिर्घोषं दृढज्यमतिविक्षिपन् ॥ १८ ॥
व्यक्तं किष्कुपरीणाहं द्वादशारत्निकार्मुकम् ।
रथाक्षमात्रैरिषुभिः सर्वाः प्रच्छादयन् दिशः ॥ १९ ॥
तस्यां वीरापहारिण्यां निशायां कर्णमभ्ययात् ।
वीरोंका संहार करनेवाली उस रात्रिमें इन्द्रके वज्रकी भाँति भयानक टंकार करनेवाले और सुदृढ़ प्रत्यंचावाले एक हाथ चौड़े एवं बारह अरत्नि लंबे धनुषको खींचता और रथके धुरेके समान मोटे बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करता हुआ घटोत्कच (पूर्वोक्त रथपर आरूढ़ हो) कर्णकी ओर चला ॥ १८-१९ १/२ ॥

तस्य विक्षिपतश्चापं रथे विष्टभ्य तिष्ठतः ॥ २० ॥
अश्रूयत धनुर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः ।
रथपर स्थिरतापूर्वक खड़े हो जब वह अपने धनुषको खींच रहा था, उस समय उसकी टंकार वज्रकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी देती थी ॥ २० १/२ ॥

तेन वित्रास्यमानानि तव सैन्यानि भारत ॥ २१ ॥
समकम्पन्त सर्वाणि सिन्धोरिव महोर्मयः ।
भारत! उस घोर शब्दसे डरायी हुई आपकी सारी सेनाएँ समुद्रकी बड़ी-बड़ी लहरोंके समान काँपने लगीं ॥ २१ १/२ ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य विरूपाक्षं विभीषणम् ॥ २२ ॥
उत्स्मयन्निव राधेयस्त्वरमाणोऽभ्यवारयत् ।