महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1309, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब कर्ण भीमसेनके मायावी पुत्रको अपने बाणोंद्वारा आकाशमें उसी प्रकार बींधने लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको विद्ध कर देते हैं ।। ५२ १/२ ।। तस्य सर्वान् हयान् हत्वा संछिद्य शतधा रथम् ।। ५३ ।। अभ्यवर्षच्छरैः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् । उसके सारे घोड़ोंको मारकर और रथके सैकड़ों टुकड़े करके कर्णने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति बाणोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी ।। ५३ १/२ ।। न चास्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् ।। ५४ ।। सोऽदृश्यत मुहूर्तेन श्वाविच्छललितो यथा । घटोत्कचके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं बचा था, जो बाणोंसे विदीर्ण न हो गया हो। वह दो ही घड़ीमें काँटोंसे युक्त साहीके समान दिखायी देने लगा ।। न हयान्न रथं तस्य न ध्वजं न घटोत्कचम् ।। ५५ ।। दृष्टवन्तः स्म समरे शरौघैरभिसंवृतम् । समरांगणमें बाणोंके समूहसे घिरे हुए घटोत्कचको, उसके घोड़ोंको, रथको तथा ध्वजको भी कोई नहीं देख पाते थे ।। ५५ १/२ ।। स तु कर्णस्य तद् दिव्यमस्त्रमस्त्रेण शातयन् ।। ५६ ।। मायायुद्धेन मायावी सूतपुत्रमयोध्यत् । वह मायावी राक्षस कर्णके दिव्यास्त्रको अपने अस्त्रद्वारा काटते हुए वहाँ सूतपुत्रके साथ मायामय युद्ध करने लगा ।। ५६ १/२ ।। सोऽयोध्यत् तदा कर्णं मायया लाघवेन च ।। ५७ ।। अलक्ष्यमाणानि दिवि शरजालानि चापतन् । उस समय माया तथा शीघ्रकारिताके द्वारा वह कर्णको लड़ा रहा था। आकाशसे कर्णपर अलक्षित बाणसमूहोंकी वर्षा हो रही थी ।। ५७ १/२ ।। भैमसेनिर्महामायो मायया कुरुसत्तम ।। ५८ ।। विचचार महाकायो मोहयन्निव भारत । कुरुश्रेष्ठ! भरतनन्दन! वह विशालकाय महामायावी भीमसेनकुमार घटोत्कच मायासे सबको मोहित करता हुआ-सा सब ओर विचरने लगा ।। ५८ १/२ ।। स तु कृत्वा विरूपाणि वदनान्यशुभानि च ।। ५९ ।। अग्रसत् सूतपुत्रस्य दिव्यान्यस्त्राणि मायया । उसने मायाद्वारा बहुत-से विकराल एवं अमंगल-सूचक मुख बनाकर सूतपुत्रके दिव्यास्त्रोंको अपना ग्रास बना लिया ।। ५९ १/२ ।। पुनश्चापि महाकायः संछिन्नः शतधा रणे ।। ६० ।। गतसत्त्वो निरुत्साहः पतितः खाद्यदृश्यत ।