भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1316

नागराजके समान घटोत्कचकी ओर देखना कठिन हो रहा था। वह कर्णके धनुषसे छूटे हुए शिखाहीन बाणोंद्वारा आच्छादित हो वहीं अन्तर्धान हो गया ॥ १०८ ॥ राक्षसाश्च पिशाचाश्च यातुधानास्तथैव च । शालावृकाश्च बहवो वृकाश्च विकृताननाः ॥ १०९ ॥ ते कर्णं क्षपयिष्यन्तः सर्वतः समुपाद्रवन् । अथैनं वाग्भिरुग्राभिस्त्रासयांचक्रिरे तदा ॥ ११० ॥ उस समय बहुत-से राक्षस, पिशाच, यातुधान, कुत्ते और विकराल मुखवाले भेड़िये कर्णको काटनेके लिये सब ओरसे उसपर टूट पड़े और अपनी भयंकर गर्जनाओंद्वारा उसे भयभीत करने लगे ॥ १०९-११० ॥ उद्यतैर्बहुभिर्घोरैरायुधैः शोणितोक्षितैः । तेषामनेकैरेकैकं कर्णो विव्याध सायकैः ॥ १११ ॥ कर्णने खूनसे रँगे हुए अपने बहुत-से भयंकर आयुधों तथा बाणोंद्वारा उनमेंसे प्रत्येकको बींध डाला ॥ १११ ॥ प्रतिहत्य तु तां मायां दिव्येनास्त्रेण राक्षसीम् । आजघान हयानस्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ११२ ॥ अपने दिव्यास्त्रसे उस राक्षसी मायाका विनाश करके उसने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे घटोत्कचके घोड़ोंको मार डाला ॥ ११२ ॥ ते भग्ना विक्षताङ्गाश्च भिन्नपृष्ठाश्च सायकैः । वसुधामन्वपद्यन्त पश्यतस्तस्य रक्षसः ॥ ११३ ॥ उन घोड़ोंके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे, बाणोंकी मारसे उनके पृष्ठभाग फट गये थे, अतः उस राक्षसके देखते-देखते वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ११३ ॥ स भग्नमायो हैडिम्बिः कर्णं वैकर्तनं तदा । एष ते विदधे मृत्युमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ ११४ ॥ इस प्रकार अपनी माया नष्ट हो जानेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने सूर्यपुत्र कर्णसे कहा—'यह ले, मैं अभी तेरी मृत्युका आयोजन करता हूँ' ऐसा कहकर वह वहीं अदृश्य हो गया ॥ ११४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कर्णघटोत्कचयुद्धे पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें कर्ण और घटोत्कचका युद्धविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥