भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1323

प्रभो! तब घटोत्कचने भी कर्णको छोड़कर अपने समीप आते हुए शत्रुको बाणोंद्वारा पीड़ित करना आरम्भ किया ।। १४ ।।

तयोः समभवद् युद्धं क्रुद्धयो राक्षसेन्द्रयोः । मत्तयोर्वासिताहेतोर्द्विपयोरिव कानने ।। १५ ।। फिर तो क्रोधमें भरे हुए उन दोनों राक्षसराजोंमें वनके भीतर हथिनीके लिये लड़नेवाले दो मतवाले हाथियोंके समान घोर युद्ध होने लगा ।। १५ ।।

रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः । अभ्यद्रवद् भीमसेनं रथेनादित्यवर्चसा ।। १६ ।। राक्षससे छूटनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने भी सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा भीमसेनपर धावा किया ।। १६ ।।

तमायान्तमनादृत्य दृष्ट्वा ग्रस्तं घटोत्कचम् । अलायुधेन समरे सिंहेनेव गवां पतिम् ।। १७ ।। रथेनादित्यवपुषा भीमः प्रहरतां वरः । किरन् शरौघान् प्रयायावलायुधरथं प्रति ।। १८ ।। आते हुए कर्णकी उपेक्षा करके समरांगणमें सिंहके चंगुलमें फँसे हुए साँड़की भाँति घटोत्कचको अलायुधका ग्रास बनते देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीमसेन सूर्यके समान तेजस्वी रथके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए अलायुधके रथकी ओर बड़े वेगसे बढ़े ।। १७-१८ ।।

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य स तदालायुधः प्रभो । घटोत्कचं समुत्सृज्य भीमसेनं समाह्वयत् ।। १९ ।। प्रभो! उस समय उन्हें आते देख अलायुधने घटोत्कचको छोड़कर भीमसेनको ललकारा ।। १९ ।।

तं भीमः सहसाभ्येत्य राक्षसान्तकरः प्रभो । सगणं राक्षसेन्द्रं तं शरवर्षैरवाकिरत् ।। २० ।। राजन्! राक्षसोंका विनाश करनेवाले भीमने सहसा निकट जाकर सैनिकगणोंसहित राक्षसराज अलायुधको अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।। २० ।।

तथैवालायुधो राजन् शिलाधौतैरजिह्मगैः । अभ्यवर्षत कौन्तेयं पुनः पुनररिंदम ।। २१ ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! उसी प्रकार अलायुध भी कुन्तीकुमार भीमसेनपर शिलापर तेज किये हुए बाणोंकी बारंबार वर्षा करने लगा ।। २१ ।।

तथा ते राक्षसाः सर्वे भीमसेनमुपाद्रवन् । नानाप्रहरणा भीमास्त्वत्सुतानां जयैषिणः ।। २२ ।।