भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 133

राजन्! तदनन्तर विधिपूर्वक सजाये हुए चंचल घोड़ोंवाले रथपर आरूढ़ हो गर्जना करते हुए राजा पौरवने सुभद्रकुमार अभिमन्युपर आक्रमण किया ॥ ५० ॥

ततोऽभ्ययात् सत्वरितो युद्धाकाङ्क्षी महाबलः । तेन चक्रे महत् युद्धमभिमन्युररिंदमः ॥ ५१ ॥ तब शत्रुओंका दमन और युद्धकी अभिलाषा करनेवाले महाबली अभिमन्यु भी तुरंत सामने आया और उनके साथ महान् युद्ध करने लगा ॥ ५१ ॥

पौरवस्त्वथ सौभद्रं शरव्रातैरवाकिरत् । तस्यार्जुनिर्ध्वजं छत्रं धनुश्चोर्व्यामपातयत् ॥ ५२ ॥ पौरवने सुभद्राकुमारपर बाणसमूहोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। यह देख अर्जुनपुत्र अभिमन्युने उनके ध्वज, छत्र और धनुषको काटकर धरतीपर गिरा दिया ॥ ५२ ॥

सौभद्रः पौरवं त्वन्यैर्विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः । पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५३ ॥ फिर अन्य सात शीघ्रगामी बाणोंद्वारा पौरवको घायल करके अभिमन्युने पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको भी क्षत-विक्षत कर दिया ॥ ५३ ॥

ततः प्रहर्षयन् सेनां सिंहवद् विनदन् मुहुः । समादत्तार्जुनस्तूर्णं पौरवान्तकरं शरम् ॥ ५४ ॥ तत्पश्चात् अपनी सेनाका हर्ष बढ़ाते और बारंबार सिंहके समान गर्जना करते हुए अर्जुनकुमार अभिमन्युने तुरंत ही एक ऐसा बाण हाथमें लिया, जो राजा पौरवका अन्त कर डालनेमें समर्थ था ॥ ५४ ॥

तं तु संधितमाज्ञाय सायकं घोरदर्शनम् । द्वाभ्यां शराभ्यां हार्दिक्यश्छिच्छेद सशरं धनुः ॥ ५५ ॥ उस भयानक दिखायी देनेवाले सायकको धनुषपर चढ़ाया हुआ जान कृतवर्माने दो बाणोंद्वारा अभिमन्युके सायकसहित धनुषको काट डाला ॥ ५५ ॥

तदुत्सृज्य धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा । उद्धबर्ह सितं खड्गमाददानः शरावरम् ॥ ५६ ॥ तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने उस कटे हुए धनुषको फेंककर चमचमाती हुई तलवार खींच ली और ढाल हाथमें ले ली ॥ ५६ ॥

स तेनानेकतारेण चर्मणा कृतहस्तवत् । भ्रान्तासिर्व्यचरन्मार्गान् दर्शयन् वीर्यमात्मनः ॥ ५७ ॥ उसने अपनी शक्तिका परिचय देते हुए सुशिक्षित हाथोंवाले पुरुषकी भाँति अनेक ताराओंके चिह्नोंसे युक्त ढालके साथ अपनी तलवारको घुमाते और अनेक पैंतरे दिखाते हुए रणभूमिमें विचरना आरम्भ किया ॥ ५७ ॥

भ्रामितं पुनरुद्भ्रान्तमाधूतं पुनरुत्थितम् ।