महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर उससे सोनेके पंखवाले बाण गिरने लगे। शक्ति, ऋष्टि, प्रास, मुसल आदि आयुध, फरसे, तेलमें साफ किये गये खड्ग, चमचमाती हुई धारवाले तोमर, पट्टिश, तेजस्वी परिघ, लोहेसे बँधी हुई विचित्र गदा, तीखी धारवाले शूल, सोनेके पत्रसे मढ़ी गयी भारी गदाएँ और शतघ्नियां चारों ओर प्रकट होने लगीं ।। २६-२७ ।।
महाशिलाश्चापतंस्तत्र तत्र सहस्रशः साशनयश्च वज्राः । चक्राणि चानेकशतक्षुराणि प्रादुर्बभूवुर्ज्वलनप्रभाणि ।। २८ ।।
जहाँ-तहाँ हजारों बड़ी-बड़ी शिलाएँ गिरने लगीं, बिजलियोंसहित वज्र पड़ने लगे और अग्निके समान दीप्तिमान् कितने ही चक्रों तथा सैकड़ों छुरोंका प्रादुर्भाव होने लगा ।। २८ ।।
तां शक्तिपाषाणपरश्वधानां प्रासासिवज्राशनिमुद्गराणाम् । वृष्टिं विशालां ज्वलितां पतन्तीं कर्णः शरौघैर्न शशाक हन्तुम् ।। २९ ।।
शक्ति, प्रस्तर, फरसे, प्रास, खड्ग, वज्र, बिजली और मुद्गरोंकी गिरती हुई उस ज्वालापूर्ण विशाल वर्षाको कर्ण अपने बाणसमूहोंद्वारा नष्ट न कर सका ।।
शराहतानां पततां हयानां वज्राहतानां च तथा गजानाम् । शिलाहतानां च महारथानां महान् निनादः पततां बभूव ।। ३० ।।
बाणोंसे घायल होकर गिरते हुए घोड़ों, वज्रसे आहत होकर धराशायी होते हुए हाथियों तथा शिलाओंकी मार खाकर गिरते हुए महारथियोंका महान् आर्तनाद वहाँ सुनायी देता था ।। ३० ।।
सुभीमनानाविधशस्त्रपातै- र्घटोत्कचेनाभिहतं समन्तात् । दौर्योधनं वै बलमार्तरूप- मावर्तमानं ददृशे भ्रमत् तत् ।। ३१ ।।
घटोत्कचके द्वारा चलाये हुए अत्यन्त भयंकर एवं नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहारसे हताहत हुई दुर्योधनकी सेना आर्त होकर चारों ओर घूमती और चक्कर काटती दिखायी देने लगी ।। ३१ ।।
हाहाकृतं सम्परिवर्तमानं संलीयमानं च विषण्णरूपम् ।