भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1347

ऊर्ध्वं ययौ दीप्यमाना निशायां नक्षत्राणामन्तराण्याविवेश ।। ५७ ।। वह प्रज्वलित शक्ति राक्षस घटोत्कचकी उस मायाको भस्म करके उसके वक्षःस्थलको गहराईतक चीरकर रात्रिके समय प्रकाशित होती हुई ऊपरको चली गयी और नक्षत्रोंमें जाकर विलीन हो गयी ।। ५७ ।।

स निर्भिन्नो विविधैरस्त्रपूगै- र्दिव्यैर्नागैर्मानुषै राक्षसैश्च । नदन् नादान् विविधान् भैरवांश्च प्राणानिष्टांस्त्याजितः शक्रशक्त्या ।। ५८ ।। घटोत्कचका शरीर पहलेसे ही दिव्य नाग, मनुष्य और राक्षससम्बन्धी नाना प्रकारके अस्त्रसमूहोंद्वारा छिन्न-भिन्न हो गया था। वह विविध प्रकारसे भयंकर आर्तनाद करता हुआ इन्द्रशक्तिके प्रभावसे अपने प्यारे प्राणोंसे वंचित हो गया।

इदं चान्यच्चित्रमाश्चर्यरूपं चकारासौ कर्म शत्रूक्षयाय । तस्मिन् काले शक्तिनिर्भिन्नमर्मा बभौ राजन् शैलमेघप्रकाशः ।। ५९ ।। राजन्! मरते समय उसने शत्रुओंका संहार करनेके लिये यह दूसरा विचित्र एवं आश्चर्ययुक्त कर्म किया। यद्यपि शक्तिके प्रहारसे उसके मर्मस्थल विदीर्ण हो चुके थे तो भी वह अपना शरीर बढ़ाकर पर्वत और मेघके समान लंबा-चौड़ा प्रतीत होने लगा ।। ५९ ।।

ततोऽन्तरिक्षादपतद् गतासुः स राक्षसेन्द्रो भुवि भिन्नदेहः । अवाक्शिराः स्तब्धगात्रो विजिह्वो घटोत्कचो महदास्थाय रूपम् ।। ६० ।। इस प्रकार विशाल रूप धारण करके विदीर्ण शरीरवाला राक्षसराज घटोत्कच नीचे सिर करके प्राणशून्य हो आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसका अंग-अंग अकड़ गया था और जीभ बाहर निकल आयी थी ।।

स तद् रूपं भैरवं भीमकर्मा भीमं कृत्वा भैमसैनिः पपात । हतोऽप्येवं तव सैन्यैकदेश- मपोथयत् स्वेन देहेन राजन् ।। ६१ ।। महाराज! भयंकर कर्म करनेवाला भीमसेनपुत्र घटोत्कच अपना वह भीषण रूप बनाकर नीचे गिरा। इस प्रकार मरकर भी उसने अपने शरीरसे आपकी सेनाके एक भागको कुचलकर मार डाला ।। ६१ ।।