भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 135

अभिमन्यु शत्रुओंके चलाये हुए प्रास, पट्टिश और तलवारोंको अपनी तलवारसे काट देते और अपनी ढालपर भी रोक लेते थे ।। ६५ ।।

स दर्शयित्वा सैन्यानां स्वबाहुबलमात्मनः । तमुद्यम्य महाखड्गं चर्म चाथ पुनर्बली ॥ ६६ ॥ वृद्धक्षत्रस्य दायादं पितुरत्यन्तवैरिणम् । ससाराभिमुखः शूरः शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ ६७ ॥ शूर एवं बलवान् अभिमन्यु सैनिकोंको अपना बाहुबल दिखाकर पुनः विशाल खड्ग और ढाल हाथमें ले अपने पिताके अत्यन्त वैरी वृद्धक्षत्रके पुत्र जयद्रथके सम्मुख उसी प्रकार चला, जैसे सिंह हाथीपर आक्रमण करता है ।। ६६-६७ ।।

तौ परस्परमासाद्य खड्गदन्तनखायुधौ । हृष्टवत् सम्प्रजह्राते व्याघ्रकेसरिणाविव ॥ ६८ ॥ वे दोनों खड्ग, दन्त और नखका आयुधके रूपमें उपयोग करते थे और बाघ तथा सिंहोंके समान एक-दूसरेसे भिड़कर बड़े हर्ष और उत्साहके साथ परस्पर प्रहार कर रहे थे ।। ६८ ।।

सम्पातेष्वभिघातेषु निपातेष्वसिचर्मणोः । न तयोरन्तरं कश्चिद् ददर्श नरसिंहयोः ॥ ६९ ॥ ढाल और तलवारके सम्पात (प्रहार), अविघात (बदलेके लिये प्रहार) और निपात (ऊपर-नीचे तलवार चलाने)-की कलामें उन दोनों पुरुषसिंह अभिमन्यु और जयद्रथमें किसीको कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ।। ६९ ।।

अवक्षेपोऽसिनिर्ह्रादः शस्त्रान्तरनिदर्शनम् । बाह्यान्तरनिपातश्च निर्विशेषमदृश्यत ॥ ७० ॥ खड्गका प्रहार, खड्ग-संचालनके शब्द, अन्यान्य शस्त्रोंके प्रदर्शन तथा बाहर-भीतरकी चोटें करनेमें उन दोनों वीरोंकी समान योग्यता दिखायी देती थी ।। ७० ।।

बाह्यमाभ्यन्तरं चैव चरन्तौ मार्गमुत्तमम् । ददृशाते महात्मानौ सपक्षाविव पर्वतौ ॥ ७१ ॥ वे दोनों महामनस्वी वीर बाहर और भीतर चोट करनेके उत्तम पैंतरे बदलते हुए पंखयुक्त दो पर्वतोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ।। ७१ ।।

ततो विक्षिप्तः खड्गं सौभद्रस्य यशस्विनः । शरावरपणपक्षान्ते प्रजहार जयद्रथः ॥ ७२ ॥ इसी समय तलवार चलाते हुए यशस्वी सुभद्रकुमारकी ढालपर जयद्रथने प्रहार किया ।। ७२ ।।

रुक्मपत्रान्तरे सक्तस्तस्मिंश्चर्मणि भास्वरे । सिन्धुराजबलोद्धूतः सोऽभज्यत महानसिः ॥ ७३ ॥