महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1351, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'घटोत्कचको मारा गया देख हमारी सेनाएँ यहाँ युद्धसे विमुख होकर भागी जा रही हैं। हिडिम्बाकुमारके धराशायी होनेसे हमलोग भी अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं ॥ ७ ॥ नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन । तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ॥ ८ ॥ 'परंतु जनार्दन! आपको जो इतनी खुशी हो रही है उसका कोई छोटा-मोटा कारण न होगा। वही मैं आपसे पूछता हूँ। सत्यवक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप इसका मुझे यथार्थ कारण बताइये ॥ ८ ॥ यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिंदम । धैर्यस्य वैकृतं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ॥ ९ ॥ 'शत्रुदमन! यदि कोई गोपनीय बात न हो तो मुझे अवश्य बतावें। मधुसूदन! आपके इस हर्ष-प्रदर्शनसे आज हमारा धैर्य छूटा जा रहा है, अतः आप इसका कारण अवश्य बतावें ॥ ९ ॥ समुद्रस्येव संशोषं मेरोरिव विसर्पणम् । तथैतदद्य मन्येऽहं तव कर्म जनार्दन ॥ १० ॥ 'जनार्दन! जैसे समुद्रका सूखना और मेरु पर्वतका विचलित होना आश्चर्यकी बात है, उसी प्रकार आज मैं आपके इस हर्षप्रकाशनरूपी कर्मको आश्चर्यजनक मानता हूँ' ॥ १० ॥
श्रीवासुदेव उवाच
अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजय । अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ॥ ११ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**धनंजय! आज वास्तवमें मुझे यह अत्यन्त हर्षका अवसर प्राप्त हुआ है, इसका क्या कारण है, यह तुम मुझसे सुनो। मेरे मनको तत्काल अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करनेवाला वह उत्तम कारण इस प्रकार है ॥ ११ ॥ शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते । कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनंजय ॥ १२ ॥ महातेजस्वी धनंजय! इन्द्रकी दी हुई शक्तिको घटोत्कचके द्वारा कर्णके हाथसे दूर कराकर अब तुम युद्धमें कर्णको शीघ्र मरा हुआ ही समझो ॥ १२ ॥ शक्तिहस्तं पुनः कर्णं को लोकेऽस्ति पुमानिह । य एनमभितस्तिष्ठेत् कार्तिकेयमिवाहवे ॥ १३ ॥ इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो युद्धस्थलमें कार्तिकेयके समान शक्तिशाली कर्णके सामने खड़ा हो सके ॥ १३ ॥ दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापहृतकुण्डलः ।