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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1353

महाबाहो! जबसे महात्मा इन्द्रने कर्णको उसके दिव्य कवच और कुण्डलोंके बदलेमें

अपनी शक्ति दी थी, जिसे उसने घटोत्कचपर चला दिया है, उस शक्तिको पाकर धर्मात्मा

कर्ण सदा तुम्हें रणभूमिमें मारा गया ही मानता था ।। २१-२२ ।।

एवंगतोऽपि शक्योऽयं हन्तुं नान्येन केनचित् ।

ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ।। २३ ।।

पुरुषसिंह! आज ऐसी अवस्थामें आकर भी कर्ण तुम्हारे सिवा किसी दूसरे योद्धासे

नहीं मारा जा सकता। अनघ! मैं सत्यकी शपथ खाकर यह बात कहता हूँ ।। २३ ।।

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।

रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ।। २४ ।।

कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी

दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष (धर्मात्मा) कहा गया है ।। २४ ।।

युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासनः ।

केसरीव वने नर्दन् मातङ्ग इव यूथपान् ।। २५ ।।

विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्धनि ।

महाबाहु कर्ण युद्धमें कुशल है। उसका धनुष सदा उठा ही रहता है। वनमें दहाड़नेवाले

सिंहके समान वह सदा गर्जता रहता है। जैसे मतवाला हाथी कितने ही यूथपतियोंको

मदरहित कर देता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धके मुहानेपर सिंहके समान पराक्रमी

महारथियोंका भी घमंड चूर कर देता है ।। २५ १/२ ।।

मध्यं गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् ।। २६ ।।

त्वदीयैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः ।

शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ।। २७ ।।

पुरुषसिंह! तुम्हारे महामनस्वी श्रेष्ठ योद्धा दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति कर्णकी

ओर देख भी नहीं सकते। जैसे शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशमें सूर्य अपनी सहस्रों किरणें

बिखेरता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धमें अपने बाणोंका जाल-सा बिछा देता है ।। २६-२७ ।।

तपान्ते जलदो यद्वच्छरधाराः क्षरन् मुहुः ।

दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ।। २८ ।।

जैसे वर्षाकालमें बरसनेवाला मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार दिव्यास्त्ररूपी

जल प्रदान करनेवाला कर्णरूपी मेघ बारंबार बाणधाराकी वर्षा करता रहता है ।। २८ ।।

त्रिदशैरपि चास्याद्भिः शरवर्षं समन्ततः ।

अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्भिर्मांसशोणितम् ।। २९ ।।

चारों ओर बाणोंकी वृष्टि करके शत्रुओंके शरीरोंसे रक्त और मांस बहानेवाले देवता भी

कर्णको परास्त नहीं कर सकते ।। २९ ।।

कवचेन विहीनश्च कुण्डलाभ्यां च पाण्डव ।