भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1372

अश्रूपूर्णमुखो राजा निःश्वसंश्च पुनः पुनः। कश्मलं प्राविशद् घोरं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम्॥ २३॥ इस प्रकार भीमको आदेश देकर राजा युधिष्ठिर बारंबार सिसकते हुए अपने रथपर जा बैठे। उस समय उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी। वे कर्णका पराक्रम देखकर घोर चिन्तामें डूब गये थे॥ २२-२३॥

तं तथा व्यथितं दृष्ट्वा कृष्णो वचनमब्रवीत्। मा व्यथां कुरु कौन्तेय नैतत् त्वय्युपपद्यते॥ २४॥ वैकलव्यं भरतश्रेष्ठ यथा प्राकृतपूरुषे। उन्हें इस प्रकार व्यथित देखकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘कुन्तीनन्दन! भरतश्रेष्ठ! आप दुःख न मानिये। आपके लिये मूढ़ मनुष्योंकी-सी यह व्याकुलता शोभा नहीं देती॥ २४१/२॥

उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व वह गुर्वीं धुरं विभो॥ २५॥ त्वयि वैक्लव्यमापन्ने संशयो विजये भवेत्। ‘राजन्! उठिये और युद्ध कीजिये। इस महासंग्रामका गुरुतर भार सँभालिये। प्रभो! आपके घबरा जानेपर विजय मिलनेमें संदेह है’॥ २५१/२॥

श्रुत्वा कृष्णस्य वचनं धर्मराजो युधिष्ठिरः॥ २६॥ विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां कृष्णं वचनमब्रवीत्। श्रीकृष्णका कथन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने दोनों हाथोंसे अपनी आँखें पोंछकर उनसे इस प्रकार कहा—॥

विदिता मे महाबाहो धर्माणां परमा गतिः॥ २७॥ ब्रह्महत्या फलं तस्य यैः कृतं नावबुध्यते। ‘महाबाहो! मुझे धर्मकी श्रेष्ठ गति विदित है। जो मनुष्य किसीके किये हुए उपकारको याद नहीं रखता, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है॥ २७१/२॥

अस्माकं हि वनस्थानां हैडिम्बेन महात्मना॥ २८॥ बालेनापि सता तेन कृतं साह्यं जनार्दन। ‘जनार्दन! जब हमलोग वनमें थे, उन दिनों महामनस्वी हिडिम्बाकुमारने बालक होनेपर भी हमारी बड़ी भारी सहायता की थी॥ २८१/२॥

अस्त्रहेतोर्गतं ज्ञात्वा पाण्डवं श्वेतवाहनम्॥ २९॥ असौ कृष्ण महेष्वासः काम्यके मामुपस्थितः। उषितश्च सहास्माभिर्यावन्नासीद् धनंजयः॥ ३०॥ ‘श्रीकृष्ण! श्वेतवाहन अर्जुनको अस्त्र-प्राप्तिके लिये अन्यत्र गया हुआ जानकर महाधनुर्धर घटोत्कच काम्यकवनमें मेरे पास आया और जबतक अर्जुन लौट नहीं आये तबतक हमारे साथ ही रहा॥ २९-३०॥