भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1382

महाराज! हमारे पक्षके भी बहुत-से सैनिक शत्रुओंके साथ युद्ध करना है, ऐसा समझकर खड़े थे, परंतु नींदसे उनकी आँखें लाल हो गयी थीं॥ २२॥ संसर्पन्तो रणे केचिन्निद्रान्धास्ते तथा परान्। जघ्नुः शूरा रणे शूरांस्तस्मिंस्तमसि दारुणे॥ २३॥ कुछ शूरवीर निद्रान्ध होकर भी रणभूमिमें विचरते थे और उस दारुण अन्धकारमें शत्रुपक्षके शूरवीरोंका वध कर डालते थे॥ २३॥ हन्यमानमथात्मानं परेभ्यो बहवो जनाः। नाभ्यजानन्त समरे निद्रया मोहिता भृशम्॥ २४॥ बहुत-से मनुष्य निद्रासे अत्यन्त मोहित हो जानेके कारण शत्रुओंकी ओरसे समरभूमिमें अपनेको जो मारनेकी चेष्टा होती थी, उसे समझ ही नहीं पाते थे॥ २४॥ तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय पुरुषर्षभः। उवाच वाक्यं बीभत्सुरुच्चैः संनादयन् दिशः॥ २५॥ उनकी ऐसी अवस्था जानकर पुरुषप्रवर अर्जुनने सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए उच्चस्वरसे इस प्रकार कहा—॥ २५॥ श्रान्ता भवन्तो निद्रान्धाः सर्व एव सवाहनाः। तमसा च वृते सैन्ये रजसा बहुलेन च॥ २६॥ ते यूयं यदि मन्यध्वमुपारमत सैनिकाः। निमीलयत चात्रैव रणभूमौ मुहूर्तकम्॥ २७॥ ‘सैनिको! तुम सब लोग अपने वाहनोंसहित थक गये हो और नींदसे अन्धे हो रहे हो। इधर यह सारी सेना घोर अन्धकार और बहुत-सी धूलसे ढक गयी है। अतः यदि तुम ठीक समझो तो युद्ध बंद कर दो और दो घड़ीतक इस रणभूमिमें ही सो लो॥ २६-२७॥ ततो विनिद्रा विश्रान्ताश्चन्द्रमस्युदिते पुनः। संसाधयिष्यथान्योन्यं संग्रामं कुरुपाण्डवाः॥ २८॥ ‘तत्पश्चात् चन्द्रोदय होनेपर विश्राम करनेके अनन्तर निद्रारहित हो तुम समस्त कौरव-पाण्डव योद्धा परस्पर पूर्ववत् संग्राम आरम्भ कर देना’॥ २८॥ तद् वचः सर्वधर्मज्ञा धार्मिकस्य विशाम्पते। अरोचयन्त सैन्यानि तथा चान्योन्यमब्रुवन्॥ २९॥ प्रजानाथ! धर्मात्मा अर्जुनका यह वचन समस्त धर्मज्ञोंको ठीक लगा। सारी सेनाओंने उसे पसंद किया और सब लोग परस्पर यही बात कहने लगे॥ २९॥ चुक्रुशुः कर्ण कर्णेति तथा दुर्योधनेति च। उपारमत पाण्डूनां विरता हि वरूथिनी॥ ३०॥ कौरव सैनिक ‘हे कर्ण! हे कर्ण! हे राजा दुर्योधन!’ इस प्रकार पुकारते हुए उच्चस्वरसे बोले—‘आपलोग युद्ध बंद कर दें; क्योंकि पाण्डव-सेना युद्धसे विरत हो गयी है’॥ ३०॥