भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1414

तथा द्रोणार्जुनौ चित्रमयुध्येतां महारथौ ।
आचार्यशिष्यौ राजेन्द्र कृतप्रहरणौ युधि ॥ २४ ॥
राजेन्द्र! इसी प्रकार उस युद्धस्थलमें आचार्य और शिष्य महारथी द्रोण तथा अर्जुन परस्पर प्रहार करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध कर रहे थे ॥ २४ ॥
लघुसंधानयोगाभ्यां रथयोश्च रणेन च ।
मोहयन्तौ मनुष्याणां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ २५ ॥
शीघ्रतापूर्वक बाणोंके संधान और रथोंके योगसे अपने संग्रामद्वारा वे दोनों वीर लोगोंके नेत्रों और मनको भी मोह लेते थे ॥ २५ ॥
उपारमन्त ते सर्वे योधा भरतसत्तम ।
अदृष्टपूर्वं पश्यन्तस्तद् युद्धं गुरुशिष्ययोः ॥ २६ ॥
भरतश्रेष्ठ! गुरु और शिष्यके उस अपूर्व युद्धको देखते हुए सब योद्धा संग्रामसे विरत हो गये ॥ २६ ॥
विचित्रान् पृतनामध्ये रथमार्गानुदीर्य तौ ।
अन्योन्यमपसव्यं च कर्तुं वीरौ तदेषतुः ॥ २७ ॥
वे दोनों वीर सेनाके बीचमें रथके विचित्र पैंतरे प्रकट करते हुए उस समय एक-दूसरेको दायें कर देनेकी चेष्टा करने लगे ॥ २७ ॥
पराक्रमं तयोर्योधा ददृशुस्ते सुविस्मिताः ।
तयोः समभवद् युद्धं द्रोणपाण्डवयोर्महत् ॥ २८ ॥
आमिषार्थे महाराज गगने श्येनयोरिव ।
उन द्रोणाचार्य और पाण्डुपुत्र अर्जुनके पराक्रमको वे सब सैनिक अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर देख रहे थे। महाराज! जैसे मांसके टुकड़ेके लिये आकाशमें दो बाज लड़ रहे हों, उसी प्रकार राज्यके लिये उन दोनों गुरु-शिष्योंमें बड़ा भारी युद्ध हो रहा था ॥ २८ १/२ ॥
यद् यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषया ॥ २९ ॥
तत् तत् प्रतिजघानाशु प्रहसंस्तस्य पाण्डवः ।
द्रोणाचार्य कुन्तीपुत्र अर्जुनको जीतनेकी इच्छासे जिस-जिस अस्त्रका प्रयोग करते थे, उस-उसको पाण्डुपुत्र अर्जुन हँसते हुए तत्काल काट देते थे ॥ २९ १/२ ॥
यदा द्रोणो न शक्नोति पाण्डवं स्म विशेषितुम् ॥ ३० ॥
ततः प्रादुश्चकारास्त्रमस्त्रमार्गविशारदः ।
जब द्रोणाचार्य पाण्डुपुत्र अर्जुनकी अपेक्षा अपनी विशेषता न सिद्ध कर सके, तब अस्त्रमार्गोंके ज्ञाता गुरुदेवने दिव्यास्त्रोंको प्रकट किया ॥ ३० १/२ ॥
ऐन्द्रं पाशुपतं त्वाष्ट्रं वायव्यमथ वारुणम् ॥ ३१ ॥
मुक्तं मुक्तं द्रोणचापात् तज्जघान धनंजयः ।