भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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युधिष्ठिरके मुँहसे यह वचन सुनकर महारथी द्रोणाचार्य पुत्रशोकसे संतप्त हो अपने जीवनसे निराश हो गये ।। ५७ ।। आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम् । ऋषिवाक्येन मन्वानः श्रुत्वा च निहतं सुतम् ।। ५८ ।। अपने पुत्रके मारे जानेकी बात सुनकर महर्षियोंके कथनानुसार वे अपने आपको महात्मा पाण्डवोंका अपराधी-सा मानने लगे ।। ५८ ।।

विचेताः परमोद्विग्नो धृष्टद्युम्नमवेक्ष्य च । योद्धुं नाश्क्नुवद् राजन् यथापूर्वमरिंदमः ।। ५९ ।। उनकी चेतनाशक्ति लुप्त होने लगी। वे अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। राजन्! उस समय धृष्टद्युम्नको सामने देखकर भी शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्य पूर्ववत् युद्ध न कर सके ।। ५९ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि युधिष्ठिरासत्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९० ।।

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