भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1445, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1445

वे द्रोणाचार्यका अन्त करनेकी इच्छासे युद्धमें तलवारके उपर्युक्त हाथ दिखाते हुए विचर रहे थे। ढाल-तलवार लेकर विचरते हुए धृष्टद्युम्नके उन विचित्र पैंतरोंको देखकर रणभूमिमें आये हुए योद्धा और देवता आश्चर्यचकित हो उठे थे ।। ४० १/२ ।।

ततः शरसहस्रेण शतचन्द्रमपातयत् ।। ४१ ।। चर्म खड्गं च सम्बाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः । ये तु वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिनः ।। ४२ ।। निकृष्टयुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शराः । तदनन्तर, उस युद्ध-संकटके समय विप्रवर द्रोणाचार्यने एक हजार बाणोंसे धृष्टद्युम्नकी सौ चाँदवाली ढाल और तलवार काट गिरायी। निकटसे युद्ध करते समय उपयोगमें आनेवाले जो एक बित्तेके बराबर वैतस्तिक नामक बाण होते हैं, वे समीपसे भी युद्ध करनेमें कुशल द्रोणाचार्यके ही पास थे, दूसरोंके नहीं ।। ४१-४२ १/२ ।।

ऋते शारद्वतात् पार्थाद् द्रौणेर्वैकर्तनात् तथा ।। ४३ ।। प्रद्युम्नयुयुधानाभ्यामभिमन्योश्च भारत । भारत! कृपाचार्य, अर्जुन, अश्वत्थामा, वैकर्तन, कर्ण, प्रद्युम्न, सात्यकि और अभिमन्युको छोड़कर और किसीके पास वैसे बाण नहीं थे ।। ४३ १/२ ।।

अथास्येषुं समाधत्त दृढं परमसम्मतम् ।। ४४ ।। अन्तेवासिनमाचार्यो जिघांसुः पुत्रसम्मितम् । तत्पश्चात् पुत्रतुल्य शिष्यको मार डालनेकी इच्छासे आचार्यने धनुषपर परम उत्तम सुदृढ़ बाण रखा ।। ४४ १/२ ।।

तं शरैर्दशभिस्तीक्ष्णैश्छच्छेद शिनिपुङ्गवः ।। ४५ ।। पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च महात्मनः । ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचयत् ।। ४६ ।। परंतु उस बाणको शिनिप्रवर सात्यकिने महामना कर्ण और आपके पुत्रके देखते-देखते दस तीखे बाणोंसे काट डाला और आचार्यप्रवरके द्वारा प्राणसंकटमें पड़े हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ा लिया ।। ४५-४६ ।।

चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् । द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत ।। ४७ ।। अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनंजयौ । अपूजयतां वार्ष्णेयं ब्रुवाणौ साधु साध्विति ।। ४८ ।। दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् ।

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