भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1469, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1469

अश्वत्थाम्नि हते नैष युध्येदिति मतिर्मम । हतं तं संयुगे कश्चिदाख्यात्वस्मै मृषा नरः ॥ ५१ ॥ 'मेरा ऐसा विश्वास है कि अश्वत्थामाके मारे जानेपर ये युद्ध नहीं कर सकते; अतः कोई मनुष्य इनसे झूठे ही कह दे कि 'युद्धमें अश्वत्थामा मारा गया' ॥ ५१ ॥

एतन्नारोचयद् वाक्यं कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अरोचयंस्तु सर्वेऽन्ये कृच्छ्रेण तु युधिष्ठिरः ॥ ५२ ॥ कुन्तीकुमार अर्जुनको यह बात अच्छी नहीं लगी। परंतु और सब लोगोंको जँच गयी। युधिष्ठिर बड़ी कठिनाईसे इसके लिये तैयार हुए ॥ ५२ ॥

भीमसेनस्तु सव्रीडमब्रवीत् पितरं तव । अश्वत्थामा हत इति तं नाबुध्यत ते पिता ॥ ५३ ॥ तब भीमसेनने लजाते-लजाते तुम्हारे पितासे कहा—'अश्वत्थामा मारा गया'। परंतु उनकी इस बातपर तुम्हारे पिताको विश्वास नहीं हुआ ॥ ५३ ॥

स शङ्कमानस्तन्मिथ्या धर्मराजमपृच्छत । हतं वाप्यहतं वाऽऽजौ त्वां पिता पुत्रवत्सलः ॥ ५४ ॥ उनके मनमें यह संदेह हुआ कि यह समाचार झूठा है; अतः तुम्हारे पुत्रवत्सल पिताने युद्धभूमिमें धर्मराज युधिष्ठिरसे पूछा कि 'अश्वत्थामा मारा गया या नहीं' ॥ ५४ ॥

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः । अश्वत्थामानमायोधे हतं दृष्ट्वा महागजम् ॥ ५५ ॥ भीमेन गिरिवर्ष्माणं मालवस्येन्द्रवर्मणः । उपसृत्य तदा द्रोणमुच्चैरिदमुवाच ह ॥ ५६ ॥ युधिष्ठिर असत्यके भयमें डूबे होनेपर भी विजयमें आसक्त थे, अतः मालवनरेश इन्द्रवर्माके पर्वताकार महान् गजराज अश्वत्थामाको भीमसेनके द्वारा युद्धस्थलमें मारा गया देख द्रोणाचार्यके पास जाकर वे उच्चस्वरसे इस प्रकार बोले— ॥ ५५-५६ ॥

यस्यार्थे शस्त्रमादत्से यमवेक्ष्य च जीवसि । पुत्रस्ते दयितो नित्यं सोऽश्वत्थामा निपातितः ॥ ५७ ॥ शेते विनिहतो भूमौ वने सिंहशिशुर्यथा ॥ ५८ ॥ 'आचार्य! तुम जिसके लिये हथियार उठाते हो और जिसका मुँह देखकर जीते हो, वह तुम्हारा सदाका प्यारा पुत्र अश्वत्थामा पृथ्वीपर मार गिराया गया है। जैसे वनमें सिंहका बच्चा सोता है, उसी प्रकार वह रणभूमिमें मरा पड़ा है' ॥ ५७-५८ ॥

जानन्नप्यनृतस्याथ दोषान् स द्विजसत्तमम् । अव्यक्तमब्रवीद् राजा हतः कुञ्जर इत्युत ॥ ५९ ॥ असत्य बोलनेके दोषोंको जानते हुए भी राजा युधिष्ठिरने द्विजश्रेष्ठ द्रोणसे वैसी बात कह दी। फिर वे अस्फुट स्वरमें बोले—'वास्तवमें इस नामका हाथी मारा गया' ॥ ५९ ॥