महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1473, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंरामस्य तु समः शस्त्रे पुरंदरसमो युधि । कार्तवीर्यसमो वीर्ये बृहस्पतिसमो मतौ ॥ ८ ॥ महीधरसमः स्थैर्ये तेजसाग्निसमो युवा । समुद्र इव गाम्भीर्ये क्रोधे चाशीविषोपमः ॥ ९ ॥ स रथी प्रथमो लोके दृढधन्वा जितक्लमः । शीघ्रोऽनिल इवाक्रन्दे चरन् क्रुद्ध इवान्तकः ॥ १० ॥ शस्त्रविद्यामें परशुरामके समान, युद्धकलामें इन्द्रके समान, बल-पराक्रममें कृतवीर्यपुत्र अर्जुनके समान, बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश, स्थिरता एवं धैर्यमें पर्वतके तुल्य, तेजमें अग्निके समान, गम्भीरतामें समुद्रके सदृश और क्रोधमें विषधर सर्पके समान नवयुवक अश्वत्थामा संसारका प्रधान रथी और सुदृढ़ धनुर्धर है। उसने श्रम और थकावटको जीत लिया है। वह संग्राममें वायुके समान वेगपूर्वक विचरनेवाला तथा क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान भयंकर है ॥ ८—१० ॥ अस्यता येन संग्रामे धरण्यभिनिपीडिता । यो न व्यथति संग्रामे वीरः सत्यपराक्रमः ॥ ११ ॥ वेदस्नातो व्रतस्नातो धनुर्वेदे च पारगः । महोदधिरिवाक्षोभ्यो रामो दाशरथिर्यथा ॥ १२ ॥ अश्वत्थामा जब रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करने लगता है, तब धरती भी अत्यन्त पीडित हो उठती है। वह सत्यपराक्रमी वीर संग्राममें कभी व्यथित नहीं होता है। वह वेदाध्ययन समाप्त करके स्नातक बन चुका है। ब्रह्मचर्यव्रतकी अवधि पूरी करके उसका भी स्नातक हो चुका है और धनुर्वेदका भी पारंगत विद्वान् है। महासागर तथा दशरथपुत्र श्रीरामके समान उसे कोई क्षुब्ध नहीं कर सकता ॥ ११-१२ ॥ तमधर्मेण धर्मिष्ठं धृष्टद्युम्नेन संयुगे । श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १३ ॥ उसी अश्वत्थामाने अपने धर्मिष्ठ पिता आचार्य द्रोणको युद्धमें धृष्टद्युम्नके हाथसे अधर्मपूर्वक मारा गया सुनकर क्या कहा? ॥ १३ ॥ धृष्टद्युम्नस्य यो मृत्युः सृष्टस्तेन महात्मना । यथा द्रोणस्य पाञ्चाल्यो यज्ञसेनसुतोऽभवत् ॥ १४ ॥ (हमने सुन रखा है कि) जैसे द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये पांचालदेशीय द्रुपदकुमारका जन्म हुआ था, उसी प्रकार महात्मा द्रोणने धृष्टद्युम्नकी मृत्युके लिये अश्वत्थामाको जन्म दिया था ॥ १४ ॥ तं नृशंसेन पापेन क्रूरेणादीर्घदर्शिना । श्रुत्वा निहतमाचार्यमश्वत्थामा किमब्रवीत् ॥ १५ ॥