महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1493, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वधर्मं नेच्छसे ज्ञातुं मिथ्यावचनमेव ते । भयार्दितानामस्माकं वाचा मर्माणि कृन्तसि ॥ १४ ॥ ‘तुम अपने क्षत्रिय-धर्मको नहीं जानना चाहते। तुम्हारी ये सारी बातें मिथ्या ही हैं। एक तो हम स्वयं ही भयसे पीड़ित हो रहे हैं, ऊपरसे तुम भी अपने वाग्बाणोंद्वारा हमारे मर्मस्थानोंको छेदे डालते हो ॥ १४ ॥
वपन् व्रणे क्षारमिव क्षतानां शत्रुकर्शन । विदीर्यते मे हृदयं त्वया वाक्शल्यपीडितम् ॥ १५ ॥ ‘शत्रुसूदन! जैसे कोई घायल मनुष्योंके घावपर नमक बिखेर दे (और वे वेदनासे छटपटाने लगें), उसी प्रकार तुम अपने वाग्बाणोंसे पीड़ित करके मेरे हृदयको विदीर्ण किये डालते हो ॥ १५ ॥
अधर्ममेनं विपुलं धार्मिकः सन् न बुध्यसे । यत् त्वामात्मानमस्मांश्च प्रशस्यान् न प्रशंससि ॥ १६ ॥ ‘यद्यपि तुम और हम प्रशंसाके पात्र हैं, तो भी तुम जो अपनी और हमारी प्रशंसा नहीं करते हो, यह बहुत बड़ा अधर्म है और तुम धार्मिक होते हुए इस अधर्मको नहीं समझ रहे हो ॥ १६ ॥
वासुदेवे स्थिते चापि द्रोणपुत्रं प्रशंससि । यः कलां षोडशीं पूर्णां धनंजय न तेऽर्हति ॥ १७ ॥ ‘धनंजय! भगवान् श्रीकृष्णके रहते हुए भी तुम द्रोणपुत्रकी प्रशंसा करते हो, जो तुम्हारी पूरी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ॥ १७ ॥
स्वयमेवात्मनो दोषान् ब्रुवाणः किन्न लज्जसे । दारयेयं महीं क्रोधाद् विकिरेयं च पर्वतान् ॥ १८ ॥ आविध्येतां गदां गुर्वीं भीमां काञ्चनमालिनीम् । गिरिप्रकाशान् क्षितिजान् भञ्जेयमनिलो यथा ॥ १९ ॥ ‘स्वयं ही अपने दोषोंका वर्णन करते हुए तुम्हें लज्जा क्यों नहीं आती है? आज मैं अपनी इस सुवर्णभूषित भयंकर एवं भारी गदाको क्रोधपूर्वक घुमाकर इस पृथ्वीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको चूर-चूर करके बिखेर सकता हूँ तथा प्रचण्ड आँधीकी तरह पर्वतपर प्रकाशित होनेवाले ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको भी तोड़ और उखाड़ सकता हूँ ॥ १८-१९ ॥
द्रावयेयं शरैश्चापि सेन्द्रान् देवान् समागतान् । सराक्षसगणान् पार्थ सासुरोरगमानवान् ॥ २० ॥ ‘पार्थ! असुर, नाग, मानव तथा राक्षसगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और इन्द्र भी आ जायँ तो मैं उन्हें बाणोंद्वारा मारकर भगा सकता हूँ ॥ २० ॥
स त्वमेवंविधं जानन् भ्रातरं मां नरर्षभ ।