महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1495, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेरे द्वारा द्रोणाचार्यके इस अवस्थामें मारे जानेपर यदि द्रोणपुत्र क्रोधपूर्वक भयानक गर्जना करता हो तो उसमें मेरी क्या हानि है? ।। २८ ।। न चाद्भुतमिदं मन्ये यद् द्रौणिर्युद्धसंज्ञया । घातयिष्यति कौरव्यान् परित्रातुमशक्नुवन् ।। २९ ।। मैं इसे कोई अद्भुत बात नहीं मान रहा हूँ; अश्वत्थामा इस युद्धके द्वारा कौरवोंको मरवा डालेगा; क्योंकि वह स्वयं उनकी रक्षा करनेमें असमर्थ है ।। २९ ।। यच्च मां धार्मिको भूत्वा ब्रवीषि गुरुघातिनम् । तदर्थमहमुत्पन्नः पाञ्चाल्यस्य सुतोऽनलात् ।। ३० ।। इसके सिवा तुम धार्मिक होकर जो मुझे गुरुकी हत्या करनेवाला बता रहे हो, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि मैं इसीलिये अग्निकुण्डसे पांचालराजका पुत्र होकर उत्पन्न हुआ था ।। ३० ।। यस्य कार्यमकार्यं वा युध्यतः स्यात् समं रणे । तं कथं ब्राह्मणं ब्रूयाः क्षत्रियं वा धनंजय ।। ३१ ।। धनंजय! रणभूमिमें युद्ध करते समय जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों समान हों, उसे तुम ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय कैसे कह सकते हो? ।। ३१ ।। यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद् ब्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्च्छितः । सर्वोपायैर्न स कथं वध्यः पुरुषसत्तम ।। ३२ ।। पुरुषप्रवर! जो क्रोधसे व्याकुल होकर ब्रह्मास्त्र न जाननेवालोंको भी ब्रह्मास्त्रसे ही मार डाले, उसका सभी उपायोंसे वध करना कैसे उचित नहीं है? ।। ३२ ।। विधर्मिणं धर्मविद्भिः प्रोक्तं तेषां विषोपमम् । जानन् धर्मार्थतत्त्वज्ञ किं मामर्जुन गर्हसे ।। ३३ ।। धर्म और अर्थका तत्त्व जाननेवाले अर्जुन! जो अपना धर्म छोड़कर परधर्म ग्रहण कर लेता है, उस विधर्मीको धर्मज्ञ पुरुषोंने धर्मात्माओंके लिये विषके तुल्य बताया है। यह सब जानते हुए भी तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो? ।। ३३ ।। नृशंसः स मयाऽऽक्रम्य रथ एव निपातितः । तन्मामनिन्द्यं बीभत्सो किमर्थं नाभिनन्दसे ।। ३४ ।। बीभत्सो! द्रोणाचार्य क्रूर एवं नृशंस थे, इसलिये मैंने रथपर ही आक्रमण करके उनको मार गिराया। अतः मैं निन्दाका पात्र नहीं हूँ। फिर तुम किसलिये मेरा अभिनन्दन नहीं करते हो? ।। ३४ ।। कालानलसमं पार्थ ज्वलनार्कविषोपमम् । भीमं द्रोणशिरश्छिन्नं न प्रशंससि मे कथम् ।। ३५ ।। पार्थ! द्रोणका मस्तक प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त भयंकर तथा लौकिक अग्नि, सूर्य एवं विषके तुल्य संताप देनेवाला था, अतः मैंने उसका छेदन किया है। इसके