भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 3237 में से

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वेगसे आ पहुँचे ॥ ४२ ॥ शोणितोदां रथावर्तां कृत्वा विशसने नदीम् । शूरास्थिचयसंकीर्णां प्रेतकूलापहारिणीम् ॥ ४३ ॥ तां शरौघमहाफेनां प्रासमत्स्यसमाकुलाम् । नदीमुत्तीर्य वेगेन कुरून् विद्राव्य पाण्डवः ॥ ४४ ॥ ततः किरीटी सहसा द्रोणानीकमुपाद्रवत् ।

ये उस मार-काटसे भरे हुए संग्राममें रक्तकी नदी बहाकर आये थे। उसमें शोणित ही जल था। रथकी भँवरें उठ रही थीं। शूरवीरोंकी हड्डियाँ उसमें शिलाखण्डोंके समान बिखरी हुई थीं। प्रेतोंके कंकाल उस नदीके कूल-किनारे जान पड़ते थे, जिन्हें वह अपने वेगसे तोड़-फोड़कर बहाये लिये जाती थी। बाणोंके समुदाय उसमें फेनोंके बहुत बड़े ढेरके समान जान पड़ते थे। प्रास आदि शस्त्र उसमें मत्स्यके समान छाये हुए थे। उस नदीको वेगपूर्वक पार करके कौरव-सैनिकोंको भगाकर पाण्डुनन्दन किरीटधारी अर्जुनने सहसा द्रोणाचार्यकी सेनापर आक्रमण किया ॥ ४३-४४ १/२ ॥

छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ॥ ४५ ॥ शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् । नान्तरं ददृशे कश्चित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ॥ ४६ ॥

वे अपने बाणोंके महान् समुदायसे द्रोणाचार्यको मोहमें डालते हुए-से आच्छादित करने लगे। यशस्वी कुन्तीकुमार अर्जुन इतनी शीघ्रताके साथ निरन्तर बाणोंको धनुषपर रखते

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