भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1511

तथापरे द्योतमाना ज्योतींषीवामलाम्बरे । प्रादुरासन् महाराज कार्ष्णायसमया गुडाः ॥ १८ ॥ महाराज! इसी प्रकार वहाँ निर्मल आकाशमें प्रकाशित होनेवाले ज्योतिर्मय ग्रह-नक्षत्रोंके समान काले लोहेके चलते हुए गोले भी प्रकट हो-होकर गिरने लगे ॥ चतुश्चक्रा द्विचक्राश्च शतघ्न्यो बहुला गदाः । चक्राणि च क्षुरान्तानि मण्डलानीव भास्वतः ॥ १९ ॥ फिर चार या दो पहियोंवाली शतघ्नियों (तोपें), बहुत-सी गदाएँ तथा जिनके प्रान्तभागमें छुरे लगे हुए थे, ऐसे सूर्यमण्डलके समान कितने ही चक्र प्रकट होने लगे ॥ १९ ॥ शस्त्राकृतिभिराकीर्णमतीव पुरुषर्षभ । दृष्ट्वान्तरिक्षमाविग्नाः पाण्डुपाञ्चालसृञ्जयाः ॥ २० ॥ पुरुषश्रेष्ठ! उस समय आकाशको विभिन्न शस्त्रोंके आकारवाले पदार्थोंसे अत्यन्त व्याप्त हुआ-सा देख पाण्डव, पांचाल और सृंजय योद्धा उद्विग्न हो उठे ॥ २० ॥ यथा यथा ह्यायुध्यन्त पाण्डवानां महारथाः । तथा तथा तदस्त्रं वै व्यवर्धत जनाधिप ॥ २१ ॥