भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1518

शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने पलक मारते-मारते अश्वत्थामाके पास पहुँचकर बड़ी फुर्तीसे अपने बाणोंका जाल-सा बिछाते हुए उसे ढक दिया ।। ५५ ।। ततो द्रौणिः प्रहस्यैनं द्रवन्तमभिभाष्य च । अवाकिरत् प्रदीप्ताग्रैः शरैस्तैरभिमन्त्रितैः ॥ ५६ ॥ तब अश्वत्थामाने धावा करनेवाले भीमसेनसे हँसकर बात की और उनपर नारायणास्त्रसे अभिमन्त्रित प्रज्वलित अग्रभागवाले बाणोंकी झड़ी लगा दी ।। ५६ ।। पन्नगैरिव दीप्तास्यैर्वमद्भिज्वलनं रणे । अवकीर्णोऽभवत् पार्थः स्फुलिङ्गैरिव काञ्चनैः ॥ ५७ ॥ रणभूमिमें वे बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोंके समान आग उगल रहे थे; कुन्तीकुमार भीम उनसे ढक गये, मानो उनके ऊपर स्वर्णमयी चिनगारियाँ पड़ रही हों ।। ५७ ।। तस्य रूपमभूद् राजन् भीमसेनस्य संयुगे । खद्योतैरावृतस्येव पर्वतस्य दिनक्षये ॥ ५८ ॥ राजन्! उस समय युद्धस्थलमें भीमसेनका रूप संध्याके समय जुगुनुओंसे भरे हुए पर्वतके समान प्रतीत हो रहा था ।। ५८ ।। तदस्त्रं द्रोणपुत्रस्य तस्मिन् प्रतिसमस्यति । अवर्धत महाराज यथाग्निरनिलोद्भूतः ॥ ५९ ॥ महाराज! भीमसेन जब द्रोणपुत्रके उस अस्त्रके सामने बाण मारने लगे, तब वह हवाका सहारा पाकर धधक उठनेवाली आगके समान प्रचण्ड वेगसे बढ़ने लगा ।। ५९ ।। विवर्धमानमालक्ष्य तदस्त्रं भीमविक्रमम् । पाण्डुसैन्यमृते भीमं सुमहद् भयमाविशत् ॥ ६० ॥ उस अस्त्रको बढ़ते देख भयंकर पराक्रमी भीमसेनको छोड़कर शेष सारी पाण्डव-सेनापर महान् भय छा गया ।। ६० ।। ततः शस्त्राणि ते सर्वे समुत्सृज्य महीतले । अवारोहन् रथेभ्यश्च हस्त्यश्वेभ्यश्च सर्वशः ॥ ६१ ॥ तब वे समस्त सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्रोंको धरतीपर डालकर रथ, हाथी और घोड़े आदि सभी वाहनोंसे उतर गये ।। ६१ ।। तेषु निक्षिप्तशस्त्रेषु वाहनेभ्यश्च्युतेषु च । तदस्त्रवीर्यं विपुलं भीममूर्धन्यथापतत् ॥ ६२ ॥ उनके हथियार डाल देने और वाहनोंसे उतर जानेपर उस अस्त्रकी विशाल शक्ति केवल भीमसेनके माथेपर आ पड़ी ।। ६२ ।। हाहाकृतानि भूतानि पाण्डवाश्च विशेषतः । भीमसेनमपश्यन्त तेजसा संवृतं तथा ॥ ६३ ॥