भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1521, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1521

माननीय नरेश! भीमसेन तथा उनके रथ, घोड़े और सारथि—ये सभी अश्वत्थामाके अस्त्रसे आच्छादित हो आगकी लपटोंके भीतर आ गये थे ॥ ५ ॥
यथा दग्ध्वा जगत् कृत्स्नं समये सचराचरम् ।
गच्छेद्वह्निर्विभोरास्यं तथास्त्रं भीममावृणोत् ॥ ६ ॥
जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्‌को भस्म करके परमात्माके मुखमें प्रवेश कर जाती है, उसी प्रकार उस अस्त्रने भीमसेनको चारों ओरसे ढक लिया था ॥ ६ ॥
सूर्यमग्निः प्रविष्टः स्याद् यथा चाग्निं दिवाकरः ।
तथा प्रविष्टं तत् तेजो न प्राज्ञायत पाण्डवः ॥ ७ ॥
जैसे सूर्यमें अग्नि और अग्निमें सूर्य प्रविष्ट हुए हों, उसी प्रकार उस अस्त्रका तेज तेजस्वी भीमसेनपर छा गया था; इसलिये पाण्डुपुत्र भीमसेन किसीको दिखायी नहीं पड़ते थे ॥ ७ ॥
विकीर्णमस्त्रं तद् दृष्ट्वा तथा भीमरथं प्रति ।
उदीर्यमाणं द्रौणिं च निष्प्रतिद्वन्द्वमाहवे ॥ ८ ॥
सर्वसैन्यं च पाण्डूनां न्यस्तशस्त्रमचेतनम् ।
युधिष्ठिरपुरोगांश्च विमुखांस्तान् महारथान् ॥ ९ ॥
अर्जुनो वासुदेवश्च त्वरमाणौ महाद्युती ।
अवप्लुत्य रथाद् वीरौ भीममाद्रवतां ततः ॥ १० ॥
वह अस्त्र भीमसेनके रथपर छा गया था। युद्धस्थलमें कोई प्रतिद्वन्द्वी योद्धा न होनेसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा प्रबल होता जा रहा था। पाण्डवोंकी सारी सेना हथियार डालकर (भयसे) अचेत हो गयी थी और युधिष्ठिर आदि महारथी युद्धसे विमुख हो गये थे। यह सब देखकर महातेजस्वी अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों वीर बड़ी उतावलीके साथ रथसे कूदकर भीमसेनकी ओर दौड़े ॥ ८—१० ॥
ततस्तद् द्रोणपुत्रस्य तेजोऽस्त्रबलसम्भवम् ।
विगाह्य तौ सुबलिनौ माययाऽऽविशतां तथा ॥ ११ ॥
वहाँ पहुँचकर वे दोनों अत्यन्त बलवान् वीर द्रोणपुत्रकी अस्त्र-शक्तिसे प्रकट हुई उस आगमें घुसकर मायाद्वारा उसमें प्रविष्ट हो गये ॥ ११ ॥
न्यस्तशस्त्रौ ततस्तौ तु नादहत् सोऽस्त्रजोऽनलः ।
वारुणास्त्रप्रयोगाच्च वीर्यवत्वाच्च कृष्णयोः ॥ १२ ॥
उन दोनोंने अपने हथियार रख दिये थे, वारुणास्त्रका प्रयोग किया था तथा वे दोनों कृष्ण अधिक शक्तिशाली थे; इसलिये वह अस्त्रजनित अग्नि उन्हें जला न सकी ॥ १२ ॥
ततश्चकृष्टुर्भीमं सर्वशस्त्रायुधानि च ।
नारायणास्त्रशान्त्यर्थं नरनारायणौ बलात् ॥ १३ ॥