भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1524

अवस्थिता हि पञ्चालाः पुनरेते जयैषिणः ।। २५ ।। 'अश्वत्थामन्! तुम पुनः शीघ्र ही इसी शस्त्रका प्रयोग करो; क्योंकि विजयकी अभिलाषा रखनेवाले ये पांचाल सैनिक पुनः युद्धके लिये आकर डट गये हैं' ।। अश्वत्थामा तथोक्तस्तु तव पुत्रेण मारिष । सुदीनमभिनिःश्वस्य राजानमिदमब्रवीत् ।। २६ ।। मान्यवर! आपके पुत्रके ऐसा कहनेपर अश्वत्थामाने अत्यन्त दीनभावसे उच्छ्वास लेकर राजासे इस प्रकार कहा- ।। २६ ।। नैतदावर्तते राजन्नस्त्रं द्विनोपपद्यते । आवृत्तं हि निवर्तेत प्रयोक्तारं न संशयः ।। २७ ।। 'राजन्! न तो यह अस्त्र फिर लौटता है और न इसका दुबारा प्रयोग ही हो सकता है। यदि इसका पुनः प्रयोग किया जाय तो यह प्रयोग करनेवालेको ही समाप्त कर देगा, इसमें संशय नहीं है ।। २७ ।। एष चास्त्रप्रतीघातं वासुदेवः प्रयुक्तवान् । अन्यथा विहितः संख्ये वधः शत्रोर्जनाधिप ।। २८ ।। 'जनेश्वर! श्रीकृष्णने इस अस्त्रके निवारणका उपाय बता दिया है और उसका प्रयोग किया है; अन्यथा आज युद्धमें सम्पूर्ण शत्रुओंका वध हो ही गया होता ।। २८ ।। पराजयो वा मृत्युर्वा श्रेयान् मृत्युने निर्जयः । विजिताश्चारयो ह्येते शस्त्रोत्सर्गान्मृतोपमाः ।। २९ ।। 'पराजय हो या मृत्यु, इनमें मृत्यु ही श्रेष्ठ है, पराजय नहीं। ये सारे शत्रु हार गये थे; हथियार डालकर मुर्देके समान हो गये थे' ।। २९ ।।

दुर्योधन उवाच

आचार्यपुत्र यद्येतद् द्विरस्त्रं न प्रयुज्यते । अन्यैर्गुरुघ्ना वध्यन्तामस्त्रैरस्त्रविदां वर ।। ३० ।। दुर्योधन बोला-आचार्यपुत्र! तुम तो सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो। यदि इस अस्त्रका दो बार प्रयोग नहीं हो सकता तो तुम दूसरे ही अस्त्रोंद्वारा इन गुरुघातियोंका वध करो ।। ३० ।। त्वयि शस्त्राणि दिव्यानि त्र्यम्बके चामितौजसि । इच्छतो न हि ते मुच्येत् संक्रुद्धो हि पुरंदरः ।। ३१ ।। तुममें तथा अमिततेजस्वी भगवान् शंकरमें ही सम्पूर्ण दिव्यास्त्र प्रतिष्ठित हैं। यदि तुम मारना चाहो तो क्रोधमें भरे हुए इन्द्र भी तुमसे बचकर नहीं जा सकते ।। ३१ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

तस्मिन्नस्त्रे प्रतिहते द्रोणे चोपधिना हते ।