महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1526, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! बलवान् अस्त्रवेत्ता तथा दृढ़ निश्चयवाले धृष्टद्युम्नने मृत्युको ही युद्धसे लौटनेकी अवधि निश्चित करके द्रोणपुत्रपर ही धावा किया ॥ ३९ ॥ ततो बाणमयं वर्षं द्रोणपुत्रस्य मूर्धनि । अवासृजदमेयात्मा पाञ्चाल्यो रथिनां वरः ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् अमेय आत्मबलसे सम्पन्न, रथियोंमें श्रेष्ठ पांचालपुत्र धृष्टद्युम्नने अश्वत्थामाके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ४० ॥ तं द्रौणिः समरे क्रुद्धं छादयामास पत्रिभिः । विव्याध चैनं दशभिः पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४१ ॥ अपने पिताके वधका बारंबार स्मरण करते हुए अश्वत्थामाने भी समरांगणमें कुपित हुए धृष्टद्युम्नको बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया और दस बाणोंसे मारकर उसे गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४१ ॥ द्वाभ्यां च सुविसृष्टाभ्यां क्षुराभ्यां ध्वजकार्मुके । छित्त्वा पाञ्चालराजस्य द्रौणिरन्यैः समर्दयत् ॥ ४२ ॥ इसके सिवा, अच्छी तरह छोड़े हुए दो छुरोंसे पांचाल-राजकुमारके ध्वज और धनुषको काटकर अश्वत्थामाने दूसरे बाणोंद्वारा उन्हें भलीभाँति पीड़ित किया ॥ ४२ ॥ व्यश्वसूतरथं चैनं द्रौणिश्चक्रे महाहवे । तस्य चानुचरान् सर्वान् क्रुद्धः प्राद्रावयच्छरैः ॥ ४३ ॥ इतना ही नहीं, द्रोणपुत्रने उस महायुद्धमें धृष्टद्युम्नको घोड़े, सारथि तथा रथसे भी वंचित कर दिया। साथ ही कुपित हो उनके सारे सेवकोंको भी बाणोंसे मार-मारकर खदेड़ना शुरू किया ॥ ४३ ॥ ततः प्रदुद्रुवे सैन्यं पञ्चालानां विशाम्पते । सम्भ्रान्तरूपमार्तं च न परस्परमैक्षत ॥ ४४ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर पांचालोंकी सेना भ्रान्त एवं आर्त होकर भाग चली। उसके सैनिक एक-दूसरेको देखते नहीं थे ॥ ४४ ॥ दृष्ट्वा तु विमुखान् योधान् धृष्टद्युम्नं च पीडितम् । शैनेयोऽचोदयत् तूर्णं रथं द्रौणिरथं प्रति ॥ ४५ ॥ योद्धाओंको युद्धसे विमुख और धृष्टद्युम्नको बाणोंसे पीड़ित देख सात्यकिने तुरंत अपना रथ अश्वत्थामाके रथकी ओर बढ़ाया ॥ ४५ ॥ अष्टभिर्निशितैर्बाणैरश्वत्थामानामर्दयत् । विंशत्या पुनराहत्य नानारूपैरमर्षणः ॥ ४६ ॥ विव्याध च तथा सूतं चतुर्भिश्चतुरो हयान् । धनुर्ध्वजं च संयत्तश्छिच्छेद कृतहस्तवत् ॥ ४७ ॥