भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1534

स मुहूर्तात् पुन: संज्ञां लब्ध्वा द्रौणिर्नराधिप ।। ९८ ।। क्रोधं परममातस्थौ समरे रुधिरोक्षित: । नरेश्वर! दो ही घड़ीमें पुन: सचेत हो खूनसे लथपथ हुए अश्वत्थामाने उस समरांगणमें अत्यन्त क्रोध प्रकट किया ।। ९८ १/२ ।। दृढं सोऽभिहतस्तेन पाण्डवेन महात्मना ।। ९९ ।। वेगं चक्रे महाबाहुर्भीमसेनरथं प्रति । महामना पाण्डुपुत्रने उसे गहरी चोट पहुँचायी थी। अत: महाबाहु अश्वत्थामाने भीमसेनके रथपर ही बड़े वेगसे आक्रमण किया ।। ९९ १/२ ।। तत आकर्णपूर्णानां शराणां तिग्मतेजसाम् ।। १०० ।। शतमाशीविषाभानां प्रेषयामास भारत । भारत! उसने धनुषको कानतक खींचकर प्रचण्ड तेजसे युक्त और विषैले सर्पोंके समान भयंकर सौ बाण भीमसेनपर चलाये ।। १०० १/२ ।। भीमोऽपि समरश्लाघी तस्य वीर्यमचिन्तयन् ।। १०१ ।। तूर्णं प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि पाण्डव: । युद्धकी स्पृहा रखनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेन भी उसके इस पराक्रमकी कोई परवा न करते हुए तुरंत ही उसपर भयंकर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। ततो द्रौणिर्महाराज छित्त्वाश्य विशिखैर्धनु: ।। १०२ ।। आजघानोरसि क्रुद्ध: पाण्डवं निशितै: शरै: । महाराज! तब अश्वत्थामाने कुपित हो बाणोंद्वारा भीमसेनके धनुषको काटकर उन पाण्डुपुत्रकी छातीमें पैने बाणोंका प्रहार किया ।। १०२ १/२ ।। ततोऽन्यद् धनुरादाय भीमसेनो ह्यमर्षण: ।। १०३ ।। विव्याध निशितैर्बाणैर्द्रौणिं पञ्चभिराहवे । तब अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने दूसरा धनुष लेकर युद्धस्थलमें पाँच पैने बाणोंसे द्रोणपुत्रको घायल कर दिया ।। १०३ १/२ ।। जीमूताविव घर्मान्ते तौ शरौघप्रवर्षिणौ ।। १०४ ।। अन्योन्यक्रोधताम्राक्षौ छादयामासतुर्युधि । वे दोनों क्रोधसे लाल आँखें करके बरसातके दो बादलोंके समान बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको आच्छादित करने लगे ।। १०४ १/२ ।। तलशब्दैस्ततो घोरैस्त्रासयन्तौ परस्परम् ।। १०५ ।। अयुध्येतां सुसंरब्धौ कृतप्रतिकृतैषिणौ ।