भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1536

अमुञ्चच्छरवर्षाणि प्रावृषीव बलाहकः ।। ११४ ।।
वर्षाकालमें मेघसे होनेवाली अत्यन्त घोर जलवृष्टिके समान चारों ओरसे होनेवाली अश्वत्थामाकी उस बाण-वर्षापर विचार करते हुए भयंकर पराक्रमी भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छा की और वे बरसातके बादलोंके समान बाणोंकी बौछार करने लगे ।। ११३-११४ ।।

तद् रुक्मपृष्ठं भीमस्य धनुर्घोरं महारणे ।
विकृष्यमाणं विबभौ शक्रचापमिवापरम् ।। ११५ ।।
उस महासमरमें सोनेकी पीठवाला भीमसेनका भयंकर धनुष जब खींचा जाता था, तब दूसरे इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था ।। ११५ ।।

तस्माच्छराः प्रादुरासन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
संछादयन्तः समरे द्रौणिमाहवशोभिनम् ।। ११६ ।।
रणभूमिमें अधिक शोभा पानेवाले द्रोणकुमार अश्वत्थामाको आच्छादित करते हुए सैकड़ों और हजारों बाण भीमसेनके उस धनुषसे प्रकट हो रहे थे ।।

तयोर्विसृजतोरेवं शरजालानि मारिष ।
वायुरप्यन्तरा राजन् नाशक्नोत् प्रतिसर्पितुम् ।। ११७ ।।
माननीय नरेश! इस प्रकार बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन दोनोंके बीचसे निकल जानेमें वायु भी असमर्थ हो गयी थी ।। ११७ ।।

तथा द्रौणिर्महाराज शरान् हेमविभूषितान् ।
तैलधौतान् प्रसन्नाग्रान् प्राहिणोद् वधकाङ्क्षया ।। ११८ ।।
महाराज! तदनन्तर अश्वत्थामाने भीमसेनके वधकी इच्छासे तेलमें साफ किये हुए स्वच्छ अग्रभागवाले बहुत-से स्वर्णभूषित बाण चलाये ।। ११८ ।।

तानन्तरिक्षे विशिखैस्त्रिधैककमशातयत् ।
विशेषयन् द्रोणसुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। ११९ ।।
परंतु भीमसेनने अपनी विशेषता स्थापित करते हुए अपने बाणोंद्वारा आकाशमें ही उन बाणोंमेंसे प्रत्येकके तीन-तीन टुकड़े कर डाले और द्रोणपुत्रसे कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ११९ ।।

पुनश्च शरवर्षाणि घोराण्युग्राणि पाण्डवः ।
व्यसृजद् बलवान् क्रुद्धो द्रोणपुत्रवधेप्सया ।। १२० ।।
फिर कुपित हुए पाण्डुपुत्र बलवान् भीमसेनने द्रोणपुत्रके वधकी इच्छासे उसके ऊपर पुनः घोर एवं उग्र बाण-वर्षा प्रारम्भ कर दी ।। १२० ।।

ततोऽस्त्रमायया तूर्णं शरवृष्टिं निवार्य ताम् ।
धनुश्चिच्छेद भीमस्य द्रोणपुत्रो महास्त्रवित् ।। १२१ ।।
शरैश्चैनं सुबहुभिः क्रुद्धः संख्ये पराभिनत् ।