महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1555, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवयोऽतिगैः सुष्टुतमिष्टवाग्भिः ॥ ६६ ॥ उनकी भुजाओंमें सुन्दर अंगद (बाजूबंद) और गलेमें नागमय यज्ञोपवीत शोभा पाते हैं, वे अपने पार्षदस्वरूप सम्पूर्ण भूतसमुदायोंसे सुशोभित हैं, उन्हें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वर समझना चाहिये, वे तपस्याकी निधि हैं और वृद्ध पुरुष प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं ॥ ६६ ॥
जलं दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च । नालं द्रष्टुं यं जना भिन्नवृत्ता ब्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम् ॥ ६७ ॥ जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि तथा जगत्को माप लेनेवाला काल—ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्रोहियोंके नाशक और मोक्षके परम कारण हैं, दुराचारी मनुष्य उनका दर्शन पानेमें असमर्थ हैं ॥ ६७ ॥
यं पश्यन्ति ब्राह्मणाः साधुवृत्ताः क्षीणे पापे मनसा वीतशोकाः । तं निष्पतन्तं तपसा धर्ममीड्यं तद्भक्त्या वै विश्वरूपं ददर्श । दृष्ट्वा चैनं वाङ्मनोबुद्धिदेहः संहृष्टात्मा मुमुदे वासुदेवः ॥ ६८ ॥ जिन्होंने मनसे शोक-संतापको सर्वथा दूर कर दिया है, वे सदाचारी ब्राह्मण पापोंका क्षय हो जानेपर जिनका दर्शन कर पाते हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो साक्षात् धर्म तथा स्तवन करनेयोग्य परमेश्वर हैं, वे ही महेश्वर वहाँ उनकी तपस्या और भक्तिके प्रभावसे प्रकट हो गये तथा तपस्वी नारायणने उनका दर्शन किया। उनका दर्शन करके मन, वाणी, बुद्धि और शरीरके साथ ही उनकी अन्तरात्मा हर्षसे खिल उठी। उन भगवान् वासुदेवने बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ ६८ ॥
अक्षमालापरिक्षिप्तं ज्योतिषां परमं निधिम् । ततो नारायणो दृष्ट्वा ववन्दे विश्वसम्भवम् ॥ ६९ ॥ रुद्राक्षकी मालासे विभूषित तथा तेजकी परम निधिरूप उन विश्व-विधाताका दर्शन करके भगवान् नारायणने उनकी वन्दना की ॥ ६९ ॥
वरदं पृथुचार्वङ्ग्या पार्वत्या सहितं प्रभुम् । क्रीडमानं महात्मानं भूतसङ्घगणैर्वृतम् ॥ ७० ॥ अजमीशानमव्यक्तं कारणात्मानमच्युतम् ।