भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1557, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1557

शब्द और आकाश, स्पर्श और वायु, रूप और तेज, रस और जल तथा गन्ध और पृथ्‍वीकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। काल, ब्रह्मा, वेद, ब्राह्मण तथा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ७४ ॥

अद्भ्यः स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्वं ताभिश्चैक्यं संक्षये यान्ति भूयः । एवं विद्वान् प्रभवं चाप्ययं च मत्वा भूतानां तव सायुज्यमेति ॥ ७५ ॥

जैसे जलसे उसकी बूँदें बिलग हो जाती हैं और क्षीण होनेपर कालक्रमसे वे पुनः जलमें मिलकर उसके साथ एकरूप हो जाती हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत आपसे ही उत्पन्न होते और आपमें ही लीन होते हैं। ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष आपका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७५ ॥

दिव्यामृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णौ वाचा शाखाः पिप्पलाः सप्त गोपाः । दशाप्यन्ये ये पुरं धारयन्ति त्वया सृष्टास्त्वं हि तेभ्यः परो हि ॥ ७६ ॥

अन्तःकरणमें निवास करनेवाले दो दिव्य एवं अमृतस्वरूप पक्षी (ईश्वर और जीव) हैं। सात धातुरूप सात पीपल हैं, जो उनकी रक्षा करनेवाले हैं। वेदवाणी ही उन वृक्षोंकी विविध शाखाएँ हैं। दूसरी भी दस वस्तुएँ (इन्द्रियाँ) हैं, जो पांचभौतिक शरीररूपी नगरको धारण करती हैं। ये सारे पदार्थ आपके ही रचे हुए हैं, तथापि आप इन सबसे परे हैं ॥ ७६ ॥

भूतं भव्यं भविता चाप्यधृष्यं त्वत्सम्भूता भुवनानीह विश्वा । भक्तं च मां भजमानं भजस्व मा रीरिषो मामहिताहितेन ॥ ७७ ॥

भूत, वर्तमान, भविष्य तथा अजेय काल—ये सब आपके ही स्वरूप हैं। यहाँ सम्पूर्ण लोक आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। मैं आपका भजन करनेवाला भक्त हूँ, आप मुझे अपनाइये। अहित करनेवालोंको रखकर मेरी हिंसा न कराइये ॥ ७७ ॥

आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् । अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य । सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेश- नभिष्टुतः प्रविकार्षींश्च मायाम् ॥ ७८ ॥