महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1559, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतुझे मालूम होना चाहिये, इस प्रकार श्रीकृष्णने पहले ही भगवान् शंकरसे ये अनेक वरदान पा लिये हैं। वे ही भगवान् नारायण श्रीकृष्णके रूपमें अपनी मायासे इस संसारको मोहित करते हुए विचर रहे हैं ।। ८५ ।।
तस्यैव तपसा जातं नरं नाम महामुनिम् ।
तुल्यमेतेन देवेन तं जानीह्यर्जुनं सदा ।। ८६ ।।
नारायणके ही तपसे महामुनि नर प्रकट हुए हैं, जो इन भगवान्के ही समान शक्तिशाली हैं। तू अर्जुनको सदा उन्हीं भगवान् नरका अवतार समझ ।। ८६ ।।
तावेतौ पूर्वदेवानां परमोपचितावृषी ।
लोकयात्राविधानार्थं संजायेते युगे युगे ।। ८७ ।।
ये दोनों ऋषि प्रमुख देवता, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमेंसे विष्णुस्वरूप हैं और तपस्यामें बहुत बढ़े-चढ़े हैं। ये लोगोंको धर्म-मर्यादामें रखकर उनकी रक्षाके लिये युग-युगमें अवतार ग्रहण करते हैं ।। ८७ ।।
तथैव कर्मणा कृत्स्नं महत्तपसोऽपि च ।
तेजो मन्युं च बिभ्रत्त्वं जातो रौद्रो महामते ।। ८८ ।।
स भवान् देववत् प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमयं जगत् ।
अवाकर्षस्त्वमात्मानं नियमैस्तत्प्रियेप्सया ।। ८९ ।।
महामते! तू भी (अपने पूर्वजन्ममें) भगवान् नारायणके ही समान ज्ञानवान् होकर उनके ही जैसे सत्कर्म तथा बड़ी भारी तपस्या करके उसके प्रभावसे पूर्ण तेज और क्रोध धारण करनेवाला रुद्रभक्त हुआ था और सम्पूर्ण जगत्को शंकरमय जानकर उन्हें प्रसन्न करनेकी इच्छासे तूने नाना प्रकारके कठोर नियमोंका पालन करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर डाला था ।। ८८-८९ ।।
शुभ्रमत्र भवान् कृत्वा महापुरुषविग्रहम् ।
ईजिवांस्त्वं जपैर्होमैरुपहारैश्च मानद ।। ९० ।।
मानद! तूने यहाँ परम पुरुष भगवान् शंकरके उज्ज्वल विग्रहकी स्थापना करके होम, जप और उपहारोंद्वारा उनकी आराधना की थी ।। ९० ।।
स तथा पूज्यमानस्ते पूर्वदेहेऽप्यतूतृषत् ।
पुष्कलांश्च वरान् प्रादात् तव विद्वन् हृदि स्थितान् ।। ९१ ।।
विद्वन्! इस प्रकार पूर्वजन्मके शरीरमें तुझसे पूजित होकर भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्होंने तुझे बहुत-से मनोवांछित वर प्रदान किये थे ।। ९१ ।।
जन्मकर्मतपोयोगास्तयोस्तव च पुष्कलाः ।
ताभ्यां लिङ्गेऽर्चितो देवस्त्वयार्चायां युगे युगे ।। ९२ ।।
इस प्रकार तेरे और नर-नारायणके जन्म, कर्म, तप और योग पर्याप्त हैं। नर-नारायणने शिवलिंगमें तथा तूने प्रतिमामें प्रत्येक युगमें महादेवजीकी आराधना की है ।।