महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1564, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजापतीनां प्रथमं तैजसं पुरुषं प्रभुम् ।
भुवनं भूर्भुवं देवं सर्वलोकेश्वरं प्रभुम् ॥ ९ ॥
ईशानं वरदं पार्थ दृष्टवानसि शङ्करम् ।
तं गच्छ शरणं देवं वरदं भुवनेश्वरम् ॥ १० ॥
**व्यासजीने कहा—**अर्जुन! जो प्रजापतियोंमें प्रथम, तेजःस्वरूप, अन्तर्यामी तथा सर्वसमर्थ हैं, भूर्लोक, भुवर्लोक आदि समस्त भुवन जिनके स्वरूप हैं, जो दिव्य विग्रहधारी तथा सम्पूर्ण लोकोंके शासक एवं स्वामी हैं, उन्हीं वरदायक ईश्वर भगवान् शंकरका तुमने दर्शन किया है। वे वरद देवता सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं, तुम उन्हींकी शरणमें जाओ ॥ ९-१० ॥
महादेवं महात्मानमीशानं जटिलं विभुम् ।
त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रं शिखिनं चीरवाससम् ॥ ११ ॥
वे महान् देव हैं। उनका हृदय महान् है। वे सबपर शासन करनेवाले, सर्वव्यापी और जटाधारी हैं। उनके तीन नेत्र और विशाल भुजाएँ हैं, रुद्र उनकी संज्ञा है, उनके मस्तकपर शिखा तथा शरीरपर वल्कल वस्त्र शोभा देता है ॥ ११ ॥
महादेवं हरं स्थाणुं वरदं भुवनेश्वरम् ।
जगत्प्रधानमजितं जगत्प्रीतमधीश्वरम् ॥ १२ ॥
महादेव, हर और स्थाणु आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक भगवान् शिव सम्पूर्ण भुवनोंके स्वामी हैं। वे ही जगत्के कारणभूत अव्यक्त प्रकृति हैं। वे किसीसे भी पराजित नहीं होते हैं। जगत्को प्रेम और सुखकी प्राप्ति उन्हींसे होती है। वे ही सबके अध्यक्ष हैं ॥ १२ ॥
जगद्योनिं जगद्बीजं जयिनं जगतो गतिम् ।
विश्वात्मानं विश्वसृजं विश्वमूर्तिं यशस्विनम् ॥ १३ ॥
वे ही जगत्की उत्पत्तिके स्थान, जगत्के बीज, विजयशील, जगत्के आश्रय, सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, विश्वविधाता, विश्वरूप और यशस्वी हैं ॥ १३ ॥
विश्वेश्वरं विश्वनरं कर्मणामीश्वरं प्रभुम् ।
शम्भुं स्वयम्भुं भूतेशं भूतभव्यभवोद्भवम् ॥ १४ ॥
वे ही विश्वेश्वर, विश्वनियन्ता, कर्मोंके फलदाता ईश्वर और प्रभावशाली हैं। वे ही सबका कल्याण करनेवाले और स्वयम्भू हैं। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके कारण भी वे ही हैं ॥ १४ ॥
योगं योगेश्वरं सर्वं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ।
सर्वश्रेष्ठं जगच्छ्रेष्ठं वरिष्ठं परमेष्ठिनम् ॥ १५ ॥
वे ही योग और योगेश्वर हैं, वे ही सर्वस्वरूप और सम्पूर्ण लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं। सबसे श्रेष्ठ, सम्पूर्ण जगत्से श्रेष्ठ और श्रेष्ठतम परमेष्ठी भी वे ही हैं ॥ १५ ॥
लोकत्रयविधातारमेकं लोकत्रयाश्रयम् ।