महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थातुमुत्सहते कश्चिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते ।
न हि भूतं समं तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २४ ॥
जब वे ही सामने आकर खड़े हो जायँ तो वहाँ ठहरनेका साहस कोई नहीं कर सकता है? तीनों लोकोंमें कोई भी प्राणी उनकी समानता करनेवाला नहीं है ॥ २४ ॥
गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रवः ।
विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च ॥ २५ ॥
संग्राममें भगवान् शंकरके कुपित होनेपर उनकी गन्धसे भी शत्रु बेहोश होकर काँपने लगते और अधमरे होकर गिर जाते हैं ॥ २५ ॥
तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि ।
ये चान्ये मानवा लोके ते च स्वर्गजितो नराः ॥ २६ ॥
उनको नमस्कार करनेवाले देवता सदा स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दूसरे भी जो मानव इस लोकमें उन्हें नमस्कार करते हैं, वे भी स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं ॥
ये भक्ता वरदं देवं शिवं रुद्रमुमापतिम् ।
अनन्यभावेन सदा सर्वेशं समुपासते ॥ २७ ॥
इहलोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम् ।
जो भक्त मनुष्य सदा अनन्यभावसे वरदायक देवता कल्याणस्वरूप, सर्वेश्वर उमानाथ भगवान् रुद्रकी उपासना करते हैं, वे भी इहलोकमें सुख पाकर अन्तमें परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ २७ १/२ ॥
नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा ॥ २८ ॥
रुद्राय शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे ।
कपर्दिने करालाय हर्यक्षवरदाय च ॥ २९ ॥
कुन्तीनन्दन! अतः तुम भी उन शान्तस्वरूप भगवान् शिवको सदा नमस्कार किया करो। जो रुद्र, नीलकण्ठ, कनिष्ठ (सूक्ष्म या दीप्तिमान्), उत्तम तेजसे सम्पन्न, जटाजूटधारी, विकरालस्वरूप, पिंगल नेत्रवाले तथा कुबेरको वर देनेवाले हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है ॥ २८-२९ ॥
याम्यायाव्यक्तकेशाय सद्वृत्ते शङ्कराय च ।
काम्याय हरिनेत्राय स्थाणवे पुरुषाय च ॥ ३० ॥
हरिकेशाय मुण्डाय कृशायोत्तारणाय च ।
भास्कराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे ॥ ३१ ॥
जो यमके अनुकूल रहनेवाले काल हैं, अव्यक्त स्वरूप आकाश ही जिनका केश है, जो सदाचारसम्पन्न, सबका कल्याण करनेवाले, कमनीय, पिंगलनेत्र, सदा स्थित रहनेवाले और अन्तर्यामी पुरुष हैं, जिनके केश भूरे एवं पिंगलवर्णके हैं, जिनका मस्तक मुण्डित है, जो