भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1570, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1570

बभूवुर्वशगाः पार्थ निपेतुश्च सुरासुराः ॥ ५५ ॥ पार्थ! उनके धनुषकी प्रत्यंचाके गम्भीर घोषसे अत्यन्त व्याकुल हो सम्पूर्ण लोक उनके अधीन हो गये। देवता और असुर सभी धरतीपर गिर पड़े ॥ ५५ ॥ आपश्चक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुंधरा । पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्च मोहिताः ॥ ५६ ॥ समुद्रके जलमें ज्वार आ गया, धरती काँपने लगी, पर्वत टूट-फूटकर बिखरने लगे और दिग्गज मूर्च्छित हो गये ॥ अन्धेन तमसा लोका न प्राकाशन्त संवृताः । जघ्निवान् सह सूर्येण सर्वेषां ज्योतिषां प्रभाः ॥ ५७ ॥ घोर अन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण सम्पूर्ण लोकोंमें कहीं भी प्रकाश नहीं रह गया। भगवान् शिवने सूर्यसहित सम्पूर्ण ज्योतियोंकी प्रभा नष्ट कर दी ॥ ५७ ॥ चुक्षुभुर्भयभीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च । ऋषयः सर्वभूतानामात्मनश्च सुखैषिणः ॥ ५८ ॥ महर्षि भी भयभीत एवं क्षुब्ध हो उठे। वे सम्पूर्ण भूतोंके तथा अपने लिये भी सुख चाहते हुए पुण्याहवाचन आदि शान्ति कर्म करने लगे ॥ ५८ ॥ पूषणमभ्यद्रवत शङ्करः प्रहसन्निव । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान् वै व्यशातयत् ॥ ५९ ॥ उस समय हँसते हुए-से भगवान् शंकरने पूषापर आक्रमण किया। वे पुरोडाश खा रहे थे। उन्होंने उनके सारे दाँत तोड़ डाले ॥ ५९ ॥ ततो निष्क्रमुर्देवा वेपमाना नताः स्म ते । पुनश्च संदधे दीप्तान् देवानां निशिताञ्शरान् ॥ ६० ॥ तदनन्तर सारे देवता नतमस्तक हो भयसे थरथर काँपते हुए यज्ञशालासे बाहर निकल गये। तब भगवान् शिवने देवताओंको लक्ष्य करके तीखे और तेजस्वी बाणोंका संधान किया ॥ ६० ॥ सधूमान् सस्फुलिङ्गांश्च विद्युत्तोयदसंनिभान् । तं दृष्ट्वा तु सुराः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ६१ ॥ रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्टं ते त्वकल्पयन् । धूम और चिनगारियोंसहित वे बाण बिजलीसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे। तब सम्पूर्ण देवताओंने भगवान् महेश्वरको कुपित देख उनके चरणोंमें प्रणाम किया और रुद्रके लिये उन्होंने विशिष्ट यज्ञभागकी कल्पना की ॥ भयेन त्रिदशा राजञ्छरणं च प्रपेदिरे ॥ ६२ ॥ तेन चैवातिकोपेन स यज्ञः संधितस्तदा । भग्नाश्चापि सुरा आसन् भीताश्चाद्यापि तं प्रति ॥ ६३ ॥

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