भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1591

‘सभामें परशुराम, नारद और महर्षि कण्व आदिकी कही हुई हितकर बातें आपने नहीं मानी थीं। अब उन्हें स्मरण करके क्या आपके मनमें कष्ट नहीं हो रहा है? ॥ ७ ॥ सुहृदस्त्वद्धिते युक्तान् भीष्मद्रोणमुखान् परैः । निहतान् युधि संस्मृत्य कच्चिन्न कुरुषे व्यथाम् ॥ ८ ॥ ‘आपके हितमें लगे हुए भीष्म, द्रोण आदि जो सुहृद् युद्धमें शत्रुओंके हाथसे मारे गये हैं, उन्हें याद करके क्या आप व्यथाका अनुभव नहीं करते हैं?’ ॥ ८ ॥ तमेवंवादिनं राजा सूतपुत्रं कृताञ्जलिम् । सुदीर्घमथ निःश्वस्य दुःखार्त इदमब्रवीत् ॥ ९ ॥ हाथ जोड़कर ऐसी बातें कहनेवाले सूतपुत्र संजयसे दुःखातुर राजा धृतराष्ट्रने लंबी साँस खींचकर इस प्रकार कहा ॥ ९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

आपगेये हते शूरे दिव्यास्त्रवति संजय । द्रोणे च परमेष्वासे भृशं मे व्यथितं मनः ॥ १० ॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता शूरवीर गंगानन्दन भीष्म तथा महाधनुर्धर द्रोणाचार्यके मारे जानेसे मेरे मनमें बड़ी भारी व्यथा हो रही है ॥ १० ॥ यो रथानां सहस्राणि दंशितानां दशैव तु । अहन्यहनि तेजस्वी निजघ्ने वसुसम्भवः ॥ ११ ॥ तं हतं यज्ञसेनस्य पुत्रेणेह शिखण्डिना । पाण्डवेयाभिगुप्तेन श्रुत्वा मे व्यथितं मनः ॥ १२ ॥ जो तेजस्वी भीष्म साक्षात् वसुके अवतार थे और युद्धमें प्रतिदिन दस हजार कवचधारी रथियोंका संहार करते थे। उन्हींको यहाँ पाण्डुपुत्र अर्जुनसे सुरक्षित द्रुपदकुमार शिखण्डीने मार डाला है, यह सुनकर मेरे मनमें बड़ी व्यथा हो रही है ॥ ११-१२ ॥ भार्गवः प्रददौ यस्मै परमास्त्रं महात्मने । साक्षाद् रामेण यो बाल्ये धनुर्वेद उपाकृतः ॥ १३ ॥ यस्य प्रसादात् कौन्तेया राजपुत्रा महारथाः । महारथत्वं सम्प्राप्तास्तथान्ये वसुधाधिपाः ॥ १४ ॥ तं द्रोणं निहतं श्रुत्वा धृष्टद्युम्नेन संयुगे । सत्यसंधं महेष्वासं भृशं मे व्यथितं मनः ॥ १५ ॥ जिन महात्माको भृगुनन्दन परशुरामने उत्तम अस्त्र प्रदान किया था, जिन्हें बाल्यावस्थामें धनुर्वेदकी शिक्षा देनेके लिये साक्षात् परशुरामजीने अपना शिष्य बनाया था, जिनकी कृपासे कुन्तीके पुत्र राजकुमार पाण्डव महारथी हो गये तथा अन्यान्य नरेशोंने भी महारथी कहलानेकी योग्यता प्राप्त की थी, उन्हीं सत्य-प्रतिज्ञ महाधनुर्धर द्रोणाचार्यको