भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 1599

राजानं विदुरश्चापि प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । आश्वासयामास तदा सिञ्चंस्तोयेन कौरवम् ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् विदुरने भी ऐश्वर्यशाली कुरुवंशी प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रके ऊपर जल छिड़ककर उन्हें होशमें लानेकी चेष्टा की ॥ ८ ॥ स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां ताश्च दृष्ट्वा स्त्रियो नृपः । उन्मत्त इव राजेन्द्र स्थितस्तूष्णीं विशाम्पते ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! प्रजानाथ! धीरे-धीरे होशमें आनेपर धृतराष्ट्र अपने घरकी स्त्रियोंको वहाँ उपस्थित जान पागलके समान चुपचाप बैठे रह गये ॥ ९ ॥ ततो ध्यात्वा चिरं कालं निःश्वस्य च पुनः पुनः । स्वान् पुत्रान् गर्हयामास बहु मेने च पाण्डवान् ॥ १० ॥ तदनन्तर दीर्घकालतक चिन्ता करनेके पश्चात् वे बारंबार लंबी साँस खींचते हुए अपने पुत्रोंकी निन्दा और पाण्डवोंकी अधिक प्रशंसा करने लगे ॥ १० ॥ गर्हयंश्चात्मनो बुद्धिं शकुनेः सौबलस्य च । ध्यात्वा तु सुचिरं कालं वेपमानो मुहुर्मुहुः ॥ ११ ॥ उन्होंने अपनी और सुबलपुत्र शकुनिकी बुद्धिको भी कोसा। फिर बहुत देरतक चिन्तामग्न रहनेके पश्चात् वे बारंबार काँपने लगे ॥ ११ ॥ संस्तभ्य च मनो भूयो राजा धैर्यसमन्वितः । पुनर्गावलगणिं सूतं पर्यपृच्छत संजयम् ॥ १२ ॥ फिर मनको किसी तरह स्थिर करके राजाने धैर्य धारण किया और गवल्गणके पुत्र सारथि संजयसे इस प्रकार पूछा— ॥ १२ ॥ यत् त्वया कथितं वाक्यं श्रुतं संजय तन्मया । कच्चिद् दुर्योधनः सूत न गतो वै यमक्षयम् ॥ १३ ॥ जये निराशः पुत्रो मे सततं जयकामुकः । ब्रूहि संजय तत्त्वेन पुनरुक्तां कथामिमाम् ॥ १४ ॥ ‘संजय! तुमने जो बात कही है, वह तो मैंने सुन ली, किंतु एक बात बताओ। निरन्तर विजयकी इच्छा रखनेवाला मेरा पुत्र दुर्योधन अपनी विजयसे निराश हो कहीं यमराजके लोकमें तो नहीं चला गया? संजय! तुम इस कही हुई बातको भी फिर यथार्थरूपसे कह सुनाओ' ॥ १३-१४ ॥ एवमुक्तोऽब्रवीत् सूतो राजानं जनमेजय । हतो वैकर्तनो राजन् सह पुत्रैर्महारथः ॥ १५ ॥ भ्रातृभिश्च महेष्वासैः सूतपुत्रैस्तनुत्यजैः । जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर सारथि संजय राजासे इस प्रकार बोला—‘राजन्! महारथी वैकर्तन कर्ण अपने पुत्रों तथा शरीरका मोह छोड़कर युद्ध करनेवाले महाधनुर्धर