महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1607, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राच्योदीच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च मारिष ।। ४८ ।।
पत्तीनां निहताः संघा हयानां प्रयुतानि च ।
रथव्रजाश्च निहता हताश्च वरवारणाः ।। ४९ ।।
मालव, मद्रक, भयंकर कर्म करनेवाले द्राविड़, यौधेय, ललित्थ, क्षुद्रक, उशीनर, मावेल्लक, तुण्डिकेर, सावित्रीपुत्र, प्राच्य, उदीच्य, प्रतीच्य और दाक्षिणात्य, पैदलसमूह, दस लाख घोड़े, रथोंके समूह और बड़े-बड़े गजराज अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं ।। ४७—४९ ।।
सध्वजाः सायुधाः शूराः सवर्म्माम्बरभूषणाः ।
कालेन महता यत्ताः कुशलैर्ये च वर्धिताः ।। ५० ।।
ते हताः समरे राजन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
राजन्! पालननिपुण पुरुषोंने जिनका दीर्घकालसे पालन-पोषण किया था, जो युद्धमें सदा सावधान रहनेवाले शूरवीर थे, वे सभी अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनके हाथसे ध्वज, आयुध, कवच, वस्त्र और आभूषणोंसहित समरांगणमें मारे गये ।। ५० १/२ ।।
अन्ये तथामितबलाः परस्परवधैषिणः ।। ५१ ।।
एते चान्ये च बहवो राजानः सगणा रणे ।
हताः सहस्रशो राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ५२ ।।
महाराज! एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले असीम बलशाली अन्यान्य योद्धा भी मौतके घाट उतर चुके हैं। राजन्! ये तथा और भी बहुत-से नरेश रणभूमिमें अपने दलबलके साथ सहस्रोंकी संख्यामें मारे गये हैं। आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब मैंने बता दिया ।। ५१-५२ ।।
एवमेष क्षयो वृत्तः कर्णार्जुनसमागमे ।
महेन्द्रेण यथा वृत्रो यथा रामेण रावणः ।। ५३ ।।
यथा कृष्णेन नरको मुरुश्च नरकारिणा ।
कार्तवीर्यश्च रामेण भार्गवेण यथा हतः ।। ५४ ।।
सज्ञातिबान्धवः शूरः समरे युद्धदुर्मदः ।
रणे कृत्वा महद् युद्धं घोरं त्रैलोक्यमोहनम् ।। ५५ ।।
यथा स्कन्देन महिषो यथा रुद्रेण चान्धकः ।
तथार्जुनेन स हतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः ।। ५६ ।।
सामात्यबान्धवो राजन् कर्णः प्रहरतां वरः ।