भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1613, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1613

धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः ॥ ३० ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् । महाराज! चेदिदेशका श्रेष्ठ रथी धृष्टकेतु भी युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकका पथिक हो गया ॥ ३० १/२ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरः कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३१ ॥ पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम् । पाण्डवोंके लिये पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर सत्यधृतिने भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके यमलोककी राह ली ॥ ३१ १/२ ॥

सेनाबिन्दुः कुरुश्रेष्ठ कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३२ ॥ पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपतिः । निहत्य शात्रवान् संख्ये द्रोणेन निहतो युधि ॥ ३३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! सेनाविन्दु भी युद्धमें शत्रुओंका संहार करके कालके गालमें चला गया। शिशुपालका पुत्र राजा सुकेतु भी युद्धमें शत्रुसैनिकोंका वध करके स्वयं भी द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया ॥ ३२-३३ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरो मदिराश्वश्च वीर्यवान् । सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसायकैः ॥ ३४ ॥ इसी प्रकार वीर सत्यधृति, पराक्रमी मदिराश्व और बल-विक्रमशाली सूर्यदत्त भी द्रोणाचार्यके बाणोंसे मारे गये हैं ॥ ३४ ॥

श्रेणिमांश्च महाराज युध्यमानः पराक्रमी । कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ३५ ॥ महाराज! पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले श्रेणिमान्ने युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकके मार्गका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥

तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परमास्त्रवित् । भीष्मेण निहतो राजञ्शेतेऽद्य परवीरहा ॥ ३६ ॥ राजन्! इसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला और उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पराक्रमी मागध वीर भी भीष्मजीके हाथसे मारा जाकर आज रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३६ ॥

विराटपुत्रः शङ्खस्तु उत्तरश्च महारथः । कुर्वन्तौ सुमहत् कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३७ ॥ राजा विराटके पुत्र शंख और महारथी उत्तर ये दोनों युद्धमें महान् कर्म करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३७ ॥

वसुदानश्च कदनं कुर्वाणोऽतीव संयुगे । भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३८ ॥

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