महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1615, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः
कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा
धृतराष्ट्र उवाच
मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेकस्य संजय ।
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! प्रधान पुरुष भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिके मारे जानेसे मेरी सेनाका घमंड चूर-चूर हो गया है। मैं देखता हूँ, अब यह बच नहीं सकेगी ॥ १ ॥
तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ ।
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नार्थो वै जीवितेऽसति ॥ २ ॥
वे दोनों कुरुश्रेष्ठ महाधनुर्धर वीर भीष्म और द्रोणाचार्य मेरे लिये मारे गये; यह सुन लेनेपर इस अधम जीवनको रखनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २ ॥
न च मृष्यामि राधेयं हतमाहवशोभनम् ।
यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥ ३ ॥
जिसकी दोनों भुजाओंमें समानरूपसे दस-दस हजार हाथियोंका बल था, युद्धमें शोभा पानेवाले उस राधापुत्र कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं इस शोकको सहन नहीं कर पाता हूँ ॥ ३ ॥
हतप्रवरसैन्यं मे यथा शंससि संजय ।
अहतानपि मे शंस येऽत्र जीवन्ति केचन ॥ ४ ॥
संजय! जैसा कि तुम कह रहे हो कि मेरी सेनाके प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं, उसी प्रकार यह भी बताओ कि कौन-कौन वीर नहीं मारे गये हैं। इस सेनामें जो कोई भी श्रेष्ठ वीर जीवित हैं, उनका परिचय दो ॥ ४ ॥
एतेषु हि मृतेष्वद्य ये त्वया परिकीर्तिताः ।
येऽपि जीवन्ति ते सर्वे मृता इति मतिर्मम ॥ ५ ॥
आज तुमने जिन लोगोंके नाम लिये हैं, उनकी मृत्यु हो जानेपर तो जो भी अब जीवित हैं वे सभी मरे हुएके ही समान हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५ ॥
संजय उवाच
यस्मिन् महास्त्राणि समर्पितानि
चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि ।
दिव्यानि राजन् विहितानि चैव