महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1624, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंरथियोंमें श्रेष्ठ जिस राधापुत्रने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये कंकपत्रयुक्त, तीखी धारवाले पैने बाण-समूहोंद्वारा समस्त शत्रुओंको परास्त करके उनसे कर वसूल किया था, जो दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता, उत्तम अस्त्रोंका जानकार और हमारी सेनाओंका रक्षक था, वह महातेजस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण अपने शूरवीर एवं बलशाली शत्रु पाण्डवोंद्वारा कैसे मारा गया? ।। २१-२२ १/२ ।।
वृषो महेन्द्रो देवेषु वृषः कर्णो नरेष्वपि ।। २३ ।। तृतीयमन्यं लोकेषु वृषं नैवानुशुश्रुम । देवताओंमें देवराज इन्द्रको वृष कहा गया है (क्योंकि वे जलकी वर्षा करते हैं), इसी प्रकार मनुष्योंमें भी कर्णको वृष कहा जाता था (क्योंकि वह याचकोंके लिये धनकी वर्षा करता था); इन दोके सिवा किसी तीसरे पुरुषको तीनों लोकोंमें वृष नाम दिया गया हो, वह मैंने नहीं सुना ।। २३ १/२ ।।
उच्चैःश्रवा वरोऽश्वानां राज्ञां वैश्रवणो वरः ।। २४ ।। वरो महेन्द्रो देवानां कर्णः प्रहरतां वरः । जैसे घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, राजाओंमें कुबेर और देवताओंमें महेन्द्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कर्ण योद्धाओंमें ऊँचा स्थान रखता था ।। २४ १/२ ।।
योऽजितः पार्थिवैः शूरैः समर्थैर्वीर्यशालिभिः ।। २५ ।। दुर्योधनस्य वृद्धयर्थं कृत्स्नामुर्वीमथाजयत् । यं लब्ध्वा मागधो राजा सान्त्वमानोऽथ सौहृदैः ।। २६ ।। अरौत्सीत् पार्थिवं क्षत्रमृते यादवकौरवान् । तं श्रुत्वा निहतं कर्णं द्वैरथे सव्यसाचिना ।। २७ ।। शोकार्णवे निमग्नोऽहं भिन्ना नौरिव सागरे । जो पराक्रमशाली, समर्थ एवं शूरवीर नरेशोंद्वारा भी कभी जीता न जा सका, जिसने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये समस्त भूमण्डलपर विजय पायी थी, जिसे अपना सहायक पाकर मगधनरेश जरासंधने भी सौहार्दवश शान्त हो यादवों और कौरवोंको छोड़कर भूतलके अन्य नरेशोंको ही अपने कारागारमें कैद किया था; उसी कर्णको सव्यसाची अर्जुनने द्वैरथयुद्धमें मार डाला, यह सुनकर मैं शोकके समुद्रमें डूब गया हूँ, मानो मेरी नाव बीच समुद्रमें जाकर टूट गयी हो ।। २५—२७ १/२ ।।
तं वृषं निहतं श्रुत्वा द्वैरथे रथिनां वरम् ।। २८ ।। शोकार्णवे निमग्नोऽहमप्लवः सागरे यथा । रथियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मात्मा कर्णको द्वैरथयुद्धमें मारा गया सुनकर मैं समुद्रमें नौकारहित पुरुषकी भाँति शोक-सागरमें निमग्न हो गया हूँ ।। २८ १/२ ।।
ईदृशैर्द्यद्यहं दुःखैर्न विनश्यामि संजय ।। २९ ।।