महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1627, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंजैसे समुद्रका पार नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार मैं इस शोकका अन्त नहीं देख पाता हूँ। मेरी चिन्ता अधिकाधिक बढ़ती जाती है और मरनेकी इच्छा प्रबल हो उठी है ॥ ६ ॥
कर्णस्य निधनं श्रुत्वा विजयं फाल्गुनस्य च ।
अश्रद्धेयमहं मन्ये वधं कर्णस्य संजय ॥ ७ ॥
संजय! मैं कर्णकी मृत्यु और अर्जुनकी विजयका समाचार सुनकर भी कर्णके वधको विश्वासके योग्य नहीं मानता ॥ ७ ॥
वज्रसारमयं नूनं हृदयं दुर्भिदं मम ।
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं कर्णं न दीर्यते ॥ ८ ॥
निश्चय ही मेरा हृदय वज्रके सारतत्त्वका बना हुआ है, अतः दुर्भेद्य है; तभी तो पुरुषसिंह कर्णको मारा गया सुनकर भी यह विदीर्ण नहीं हो रहा है ॥ ८ ॥
आयुर्नूनं सुदीर्घं मे विहितं दैवतैः पुरा ।
यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा जीवामीह सुदुःखितः ॥ ९ ॥
अवश्य ही पूर्वकालमें देवताओंने मेरी आयु बहुत बड़ी बना दी थी, जिसके अधीन होनेके कारण मैं कर्ण-वधका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी होनेपर भी यहाँ जी रहा हूँ ॥ ९ ॥
धिग्जीवितमिदं चैव सुहृद्धीनश्च संजय ।
अद्य चाहं दशामेतां गतः संजय गर्हिताम् ॥ १० ॥
संजय! मेरे इस जीवनको धिक्कार है। आज मैं सुहृदोंसे हीन होकर इस घृणित दशाको पहुँच गया हूँ ॥
कृपणं वर्तयिष्यामि शोच्यः सर्वस्य मन्दधीः ।
अहमेव पुरा भूत्वा सर्वलोकस्य सत्कृतः ॥ ११ ॥
परिभूतः कथं सूत परैः शक्ष्यामि जीवितुम् ।
अब मैं मन्दबुद्धि मानव सबके लिये शोचनीय होकर दीन-दुःखी मनुष्योंके समान जीवन बिताऊँगा। सूत! मैं ही पहले सब लोगोंके सम्मानका पात्र था; किंतु अब शत्रुओंसे अपमानित होकर कैसे जीवित रह सकूँगा? ॥ ११ ½ ॥
दुःखात् सुदुःखव्यसनं प्राप्तवानस्मि संजय ॥ १२ ॥
भीष्मद्रोणवधेनैव कर्णस्य च महात्मनः ।
संजय! भीष्म, द्रोण और महामना कर्णके वधसे मुझपर लगातार एक-से-एक बढ़कर अत्यन्त दुःख तथा संकट आता गया है ॥ १२ ½ ॥
नावशेषं प्रपश्यामि सूतपुत्रे हते युधि ॥ १३ ॥
स हि पारो महानासीत् पुत्राणां मम संजय ।