महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 163, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतांस्तु सर्वान् पृथग्बाणैर्वानरप्रवरध्वजः । प्रत्यविध्यद् ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद सायकान् ॥ २१ ॥ फिर कपिध्वज अर्जुनने भी पृथक्-पृथक् बाण मारकर उन सबको घायल कर दिया। भल्लोंद्वारा उनकी ध्वजाओं तथा सायकोंको भी काट गिराया ॥ २१ ॥
सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हयांश्चास्यावधीच्छरैः । अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः कायादपातयत् ॥ २२ ॥ सुधन्वाका धनुष काटकर उसके घोड़ोंको भी बाणोंसे मार डाला। फिर शिरस्त्राणसहित उसके मस्तकको भी काटकर धड़से नीचे गिरा दिया ॥ २२ ॥
तस्मिन्निपतिते वीरे त्रस्तास्तस्य पदानुगाः । व्यद्रवन्त भयाद् भीता यत्र दौर्योधनं बलम् ॥ २३ ॥ वीरवर सुधन्वाके धराशायी हो जानेपर उसके अनुगामी सैनिक भयभीत हो गये, वे भयके मारे वहीं भाग गये, जहाँ दुर्योधनकी सेना थी ॥ २३ ॥
ततो जघान संक्रुद्धो वासविस्तां महाचमूम् । शरजालैरविच्छिन्नैस्तमः सूर्य इवांशुभिः ॥ २४ ॥
तब क्रोधमें भरे हुए इन्द्रकुमार अर्जुनने बाणसमूहोंकी अविच्छिन्न वर्षा करके उस विशाल वाहिनीका उसी प्रकार संहार आरम्भ किया, जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा महान् अन्धकारका नाश करते हैं ॥ २४ ॥
ततो भग्ने बले तस्मिन् विप्रलीने समन्ततः । सव्यसाचिनि संक्रुद्धे त्रैगर्तन् भयमाविशत् ॥ २५ ॥