भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1669, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1669

चित्रसेनका वह दीप्तिशाली मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो चन्द्रमा दैवेच्छावश स्वर्गसे भूतलपर आ गिरा हो ।। १५ ।। राजानं निहतं दृष्ट्वा तेऽभिसारं तु मारिष । अभ्यद्रवन्त वेगेन चित्रसेनस्य सैनिकाः ।। १६ ।। माननीय नरेश! अभिसार देशके अधिपति राजा चित्रसेनको मारा गया देख उनके सैनिक बड़े वेगसे भाग चले ।। १६ ।। ततः क्रुद्धो महेष्वासस्तत्सैन्यं प्राद्रवच्छरैः । अन्तकाले यथा क्रुद्धः सर्वभूतानि प्रेतराट् ।। १७ ।। तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए महाधनुर्धर श्रुतकर्माने अपने बाणोंद्वारा उस सेनापर आक्रमण किया, मानो प्रलयकालमें कुपित हुए यमराज समस्त प्राणियोंपर धावा बोल रहे हों ।। १७ ।। ते वध्यमानाः समरे तव पौत्रेण धन्विना । व्यद्रवन्त दिशस्तूर्णं दावदग्धा इव द्विपाः ।। १८ ।। युद्धमें आपके धनुर्धर पौत्र श्रुतकर्माद्वारा मारे जाते हुए वे सैनिक दावानलमें झुलसे हुए हाथियोंके समान तुरंत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। १८ ।। तांस्तु विद्रवतो दृष्ट्वा निरुत्साहान् द्विषज्जये । द्रावयन्निषुभिस्तीक्ष्णैः श्रुतकर्मा व्यरोचत ।। १९ ।। शत्रुओंपर विजय पानेका उत्साह छोड़कर भागते हुए उन सैनिकोंको देखकर अपने तीखे बाणोंसे उन्हें खदेड़ते हुए श्रुतकर्माकी अपूर्व शोभा हो रही थी ।। १९ ।। प्रतिविन्ध्यस्ततश्चित्रं भित्त्वा पञ्चभिराशुगैः । सारथिं च त्रिभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेषुणापि च ।। २० ।। दूसरी ओर प्रतिविन्ध्यने पाँच बाणोंद्वारा चित्रको क्षत-विक्षत करके तीन बाणोंसे सारथिको घायल कर दिया और एक बाणसे उसके ध्वजको भी बींध डाला ।। तं चित्रो नवभिर्भल्लैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् । स्वर्णपुङ्खैः प्रसन्नाग्रैः कङ्कबर्हिणवाजितैः ।। २१ ।। तब चित्रने कंक और मयूरकी पाँखोंसे युक्त स्वच्छ धार और सुनहरे पंखवाले नौ भल्लोंसे प्रतिविन्ध्यकी दोनों भुजाओं और छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ।। २१ ।। प्रतिविन्ध्यो धनुश्छित्त्वा तस्य भारत सायकैः । पञ्चभिर्निशितैर्बाणैरथैनं स हि जघ्निवान् ।। २२ ।। भारत! प्रतिविन्ध्यने अपने बाणोंद्वारा उसके धनुषको काटकर पाँच तीखे बाणोंसे चित्रको भी घायल कर दिया ।। ततः शक्तिं महाराज स्वर्णघण्टां दुरासदाम् । प्राहिणोत् तव पौत्राय घोरामग्निशिखामिव ।। २३ ।।

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