महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1683, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें'वीर! यदि तुम मुझे यहाँ आया हुआ पूजनीय अतिथि मानो तो सब प्रकारसे आज युद्धके द्वारा मेरा आतिथ्य-सत्कार करो' ॥ २२ १/२ ॥ एवमाचार्यपुत्रेण समाहूतो युयुत्सया ॥ २३ ॥ बहु मेनेऽर्जुनोऽत्मानमिति चाह जनार्दनम् । आचार्यपुत्रके द्वारा इस प्रकार युद्धकी इच्छासे बुलाये जानेपर अर्जुनने अपना अहोभाग्य माना और भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ २३ १/२ ॥ संशप्तकाश्च मे वध्या द्रौणिराह्वयते च माम् ॥ २४ ॥ यदत्रानन्तरं प्राप्तं शंस मे तद्धि माधव । आतिथ्यकर्माभ्युत्थाय दीयतां यदि मन्यसे ॥ २५ ॥ 'माधव! एक ओर तो मुझे संशप्तकोंका वध करना है, दूसरी ओर द्रोणकुमार अश्वत्थामा युद्धके लिये मेरा आह्वान कर रहा है। अतः यहाँ मेरे लिये जो पहले कर्तव्य प्राप्त हो, उसे मुझे बताइये। यदि आप ठीक समझें तो पहले उठकर अश्वत्थामाको ही आतिथ्य ग्रहण करनेका अवसर दिया जाय' ॥ २४-२५ ॥ एवमुक्तोऽवहत् पार्थं कृष्णो द्रोणात्मजान्तिके । जैत्रेण विधिनाऽऽहूतं वायुरिन्द्रमिवाध्वरे ॥ २६ ॥ अर्जुनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णने उन्हें विजयशील रथके द्वारा द्रोणकुमारके निकट पहुँचा दिया। ठीक वैसे ही जैसे वैदिक विधिसे आवाहित इन्द्रदेवताको वायुदेव यज्ञमें पहुँचा देते हैं ॥ २६ ॥ तमामन्त्र्यैकमनसं केशवो द्रौणिमब्रवीत् । अश्वत्थामन् स्थिरो भूत्वा प्रहराशु सहस्व च ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने एकाग्रचित्त द्रोणकुमारको सम्बोधित करके कहा—'अश्वत्थामन्! स्थिर होकर शीघ्रतापूर्वक प्रहार करो और अपने ऊपर किये गये प्रहारको सहन करो ॥ २७ ॥ निर्वेटुं भर्तृपिण्डं हि कालोऽयमुपजीविनाम् । सूक्ष्मो विवादो विप्राणां स्थूलौ क्षात्रौ जयाजयौ ॥ २८ ॥ 'क्योंकि स्वामीके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह करनेवाले पुरुषोंके लिये अपने रक्षकके अन्नको सफल करनेका यही अवसर आया है, ब्राह्मणोंका विवाद सूक्ष्म (बुद्धिके द्वारा साध्य) होता है; परंतु क्षत्रियोंकी जय-पराजय स्थूल अस्त्रोंद्वारा सम्पन्न होती हैं ॥ २८ ॥ यामभ्यर्थयसे मोहाद् दिव्यां पार्थस्य सत्क्रियाम् । तामाप्तुमिच्छन् युध्यस्व स्थिरो भूत्वाद्य पाण्डवम् ॥ २९ ॥ 'तुम मोहवश अर्जुनसे जिस दिव्य सत्कारकी प्रार्थना कर रहे हो, उसे पानेकी इच्छासे आज तुम स्थिर होकर पाण्डुपुत्र धनंजयके साथ युद्ध करो' ॥ २९ ॥ इत्युक्तो वासुदेवेन तथेत्युक्त्वा द्विजोत्तमः ।