भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1689, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1689

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सप्तदशोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा अश्वत्थामाकी पराजय

संजय उवाच

ततः समभवद् युद्धं शुक्राङ्गिरसवर्चसोः ।
नक्षत्रमभितो व्योम्नि शुक्राङ्गिरसयोरिव ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर आकाशमें नक्षत्रमण्डलके निकट परस्पर युद्ध करनेवाले शुक्राचार्य और बृहस्पतिके समान वहाँ रणभूमिमें श्रीकृष्णके निकट शुक्र और बृहस्पतिके तुल्य तेजस्वी अश्वत्थामा और अर्जुनका युद्ध होने लगा ॥ १ ॥

संतापयन्तावन्योन्यं दीप्तैः शरगभस्तिभिः ।
लोकत्रासकरावास्तां विमार्गस्थौ ग्रहाविव ॥ २ ॥
जैसे वक्र या अतिचार गतिसे चलनेवाले दो ग्रह सम्पूर्ण जगत्‌के लिये त्रास उत्पन्न करनेवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर अपनी बाणमयी प्रज्वलित किरणोंद्वारा एक-दूसरेको संताप देने लगे ॥ २ ॥

ततोऽविध्यद् भ्रुवोर्मध्ये नाराचेनार्जुनो भृशम् ।
स तेन विबभौ द्रौणिरूर्ध्वरश्मिर्यथा रविः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने एक नाराचसे अश्वत्थामाकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें गहरा आघात पहुँचाया। ललाटमें धँसे हुए उस बाणसे अश्वत्थामा ऊपरकी ओर उठी हुई किरणोंवाले सूर्यके समान सुशोभित होने लगा ॥ ३ ॥

अथ कृष्णौ शरशतैरश्वत्थाम्नार्दितौ भृशम् ।
स्वरश्मिजालविकचौ युगान्तार्काविवासतुः ॥ ४ ॥
इसके बाद अश्वत्थामाने भी श्रीकृष्ण और अर्जुनको अपने सैकड़ों बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। उस समय वे दोनों अपनी किरणोंका प्रसार करनेवाले प्रलयकालके दो सूर्योंके समान प्रतीत होते थे ॥ ४ ॥

ततोऽर्जुनः सर्वतोधारमस्त्र-
मवासृजद् वासुदेवेऽभिभूते ।
द्रौणायनिं चाभ्यहनत् पृषत्कै-
र्वज्राग्निवैवस्वतदण्डकल्पैः ॥ ५ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके घायल होनेपर अर्जुनने एक ऐसे अस्त्रका प्रयोग किया, जिसकी धार सब ओर थी। उन्होंने वज्र, अग्नि और यमदण्डके समान अमोघ, दाहक और प्राणहारी बाणोंद्वारा द्रोणकुमार अश्वत्थामाको घायल कर दिया ॥ ५ ॥

स केशवं चार्जुनं चातितेजा

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