महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1696, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुकल्पितं दानवनागसंनिभं महाभ्रनिर्ह्रादममित्रमर्दनम् । रथाश्वमातङ्गगणान् सहस्रशः समास्थितो हन्ति शरैर्नरानपि ॥ ६ ॥ उनका हाथी खूब सजाया गया था, वह गजासुरके समान बलशाली, महामेघके समान गर्जना करनेवाला तथा शत्रुओंको रौंद डालनेवाला था। उसपर आरूढ़ होकर दण्डधार अपने बाणोंसे सहस्रों रथों, घोड़ों, मतवाले हाथियों और पैदल मनुष्योंका भी संहार करने लगे ॥ ६ ॥
रथानधिष्ठाय सवाजिसारथीन् नरांश्च पादैर्द्विरदो व्यपोथयत् । द्विपांश्च पद्भ्यां ममृदे करेण द्विपोत्तमो हन्ति च कालचक्रवत् ॥ ७ ॥ उनका वह हाथी रथोंपर पैर रखकर सारथि और घोड़ोंसहित उन्हें चूर-चूर कर डालता था। पैदल मनुष्योंको भी पैरोंसे ही कुचल डालता था। हाथियोंको भी दोनों पैरों तथा सूँड़से मसल देता था। इस प्रकार वह गजराज कालचक्रके समान शत्रु-सेनाका संहार करने लगा ॥ ७ ॥
नरांस्तु कार्ष्णायसवर्मभूषणान् निपात्य साश्वानपि पत्तिभिः सह । व्यपोथयद् दन्तिवरेण शुष्मिणा स शब्दवत् स्थूलनलं यथा तथा ॥ ८ ॥ वे अपने बलवान् एवं श्रेष्ठ गजराजके द्वारा लोहेके कवच तथा उत्तम आभूषण धारण करनेवाले घुड़सवारोंको घोड़ों और पैदलोंसहित पृथ्वीपर गिराकर कुचलवा देते थे। उस समय जैसे मोटे नरकुलोंके कुचले जाते समय ‘चर-चर' की आवाज होती है, उसी प्रकार उन सैनिकोंके कुचले जानेपर भी होती थी ॥ ८ ॥
अथार्जुनो ज्यातलनेमिनिःस्वने मृदङ्गभेरीबहुशङ्खनादिते । रथाश्वमातङ्गसहस्रसंकुले रथोत्तमेनाभ्यपतद् द्विपोत्तमम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर जहाँ धनुषकी टंकार और पहियोंकी घर्घराहटका शब्द गूँज रहा था, मृदंग, भेरी और बहुसंख्यक शंखोंकी ध्वनि हो रही थी तथा जहाँ रथ, घोड़े और हाथी सहस्रोंकी संख्यामें भरे हुए थे, उस समरांगणमें पूर्वोक्त गजराजके समीप अर्जुन अपने उत्तम रथके द्वारा जा पहुँचे ॥ ९ ॥
ततोऽर्जुनं द्वादशभिः शरोत्तमै-