महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1739, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! फिर चार तीखे बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी तुरंत ही यमराजके घर भेज दिया ॥ ३९ ॥ अथास्य तं रथं दिव्यं तिलशो व्यधमच्छरैः । पताकां चक्ररक्षांश्च गदां खड्गं च मारिष ॥ ४० ॥ शतचन्द्रं च तच्चर्म सर्वोपकरणानि च । मान्यवर! इसके बाद उसने अपने बाणोंद्वारा नकुलके उस दिव्य रथको तिल-तिल करके काट दिया और पताका, चक्ररक्षकों, गदा एवं खड्गको भी छिन्न-भिन्न कर दिया। साथ ही सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित उनकी ढाल तथा अन्य सब उपकरणोंको भी उसने नष्ट कर दिया ॥ ४० १/२ ॥ हताश्वो विरथश्चैव विवर्मा च विशाम्पते ॥ ४१ ॥ अवतीर्य रथात्तूर्णं परिघं गृह्य धिष्ठितः । प्रजापालक नरेश! घोड़े, रथ और कवचके नष्ट हो जानेपर नकुल तुरंत उस रथसे उतरकर हाथमें परिघ लिये खड़े हो गये ॥ ४१ १/२ ॥ तमुद्यतं महाघोरं परिघं तस्य सूतजः ॥ ४२ ॥ व्यहनत् सायकै राजन् सुतीक्ष्णैर्भारसाधनैः । राजन्! उनके उठे हुए उस महाभयंकर परिघको सूतपुत्रने अत्यन्त तीखे तथा दुष्कर कार्यको सिद्ध करनेवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४२ १/२ ॥ व्यायुधं चैनमालक्ष्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४३ ॥ आर्पयद् बहुभिः कर्णो न चैनं समपीडयत् । उन्हें अस्त्र-शस्त्रोंसे हीन देखकर कर्णने झुकी हुई गाँठवाले बहुसंख्यक बाणोंद्वारा और भी घायल कर दिया; परंतु उन्हें घातक पीड़ा नहीं दी ॥ ४३ १/२ ॥ स हन्यमानः समरे कृतास्त्रेण बलीयसा ॥ ४४ ॥ प्राद्रवत् सहसा राजन् नकुलो व्याकुलेन्द्रियः । अत्यन्त बलवान् तथा अस्त्रविद्याके विद्वान् कर्णके द्वारा समरांगणमें आहत हो सहसा नकुल भाग चले। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो रही थीं ॥ ४४ १/२ ॥ तमभिद्रुत्य राधेयः प्रहसन् वै पुनः पुनः ॥ ४५ ॥ सज्यमस्य धनुः कण्ठे व्यवासृजत भारत । भारत! राधापुत्र कर्णने बारंबार हँसते हुए उनका पीछा करके उनके गलेमें प्रत्यंचासहित अपना धनुष डाल दिया ॥ ४५ १/२ ॥ ततः स शुशुभे राजन् कण्ठासक्तमहाधनुः ॥ ४६ ॥ परिवेषमनुप्राप्तो यथा स्याद् व्योम्नि चन्द्रमाः । यथैव चासितो मेघः शक्रचापेन शोभितः ॥ ४७ ॥