महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजा युधिष्ठिरने द्रोणाचार्यके रचे हुए उस अलौकिक तथा शत्रुओंके लिये अजेय व्यूहको देखकर युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नसे इस प्रकार कहा—'कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंपर चलनेवाले वीर! आज तुम ऐसी नीतिका प्रयोग करो, जिससे मैं उस ब्राह्मणके वशमें न होऊँ' ।।
धृष्टद्युम्न उवाच
द्रोणस्य यतमानस्य वशं नैष्यसि सुव्रत । अहमावारयिष्यामि द्रोणमद्य सहानुगम् ॥ २२ ॥ धृष्टद्युम्न बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! द्रोणाचार्य कितना ही प्रयत्न क्यों न करें, आप उनके वशमें नहीं होंगे। आज मैं सेवकोंसहित द्रोणाचार्यको रोकूँगा ॥ २२ ॥ मयि जीवति कौरव्य नोद्वेगं कर्तुमर्हसि । न हि शक्तो रणे द्रोणो विजेतुं मां कथंचन ॥ २३ ॥ कुरुनन्दन! मेरे जीते-जी आपको किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिये। द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें मुझे किसी प्रकार जीत नहीं सकते ॥ २३ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा किरन् बाणान् द्रुपदस्य सुतो बली । पारावतसवर्णैश्वः स्वयं द्रोणमुपादद्रवत् ॥ २४ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! ऐसा कहकर कबूतरके समान रंगवाले घोड़े रखनेवाले महाबली द्रुपदपुत्रने बाणोंका जाल-सा बिछाते हुए स्वयं द्रोणाचार्यपर धावा किया ॥ २४ ॥ अनिष्टदर्शनं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नमवस्थितम् । क्षणेनैवाभवद् द्रोणो नातिहृष्टमना इव ॥ २५ ॥ जिसका दर्शन अनिष्टका सूचक था, उस धृष्टद्युम्नको सामने खड़ा देख द्रोणाचार्य क्षणभरमें अत्यन्त अप्रसन्न और उदास हो गये ॥ २५ ॥ (स हि जातो महाराज द्रोणस्य निधनं प्रति । मर्त्यधर्मतया तस्माद् भारद्वाजो व्यमुह्यत ॥) महाराज! वह द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये पैदा हुआ था; इसलिये उसे देखकर मर्त्यभावका आश्रय ले द्रोणाचार्य मोहित हो गये। तं तु सम्प्रेक्ष्य पुत्रस्ते दुर्मुखः शत्रुकर्षणः । प्रियं चिकीर्षुर्द्रोणस्य धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥ २६ ॥ राजन्! शत्रुओंका संहार करनेवाले आपके पुत्र दुर्मुखने द्रोणाचार्यको उदास देख धृष्टद्युम्नको आगे बढ़नेसे रोक दिया। वह द्रोणाचार्यका प्रिय करना चाहता था ॥ २६ ॥ स सम्प्रहारस्तुमुलः सुघोरः समपद्यत ।