महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1768, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिगृह्य च गजाः केचित् पार्श्वस्थैर्भृशदारुणैः । रथाश्वसादिभिस्तत्र सम्भिन्ना न्यपतन् भुवि ॥ ३२ ॥ कितने ही हाथियोंको अवरुद्ध करके पार्श्वभागमें खड़े हुए अत्यन्त भयंकर रथी और घुड़सवार उन्हें बाणोंसे विदीर्ण कर डालते, जिससे वे हाथी वहीं पृथ्वीपर गिर जाते थे ॥ ३२ ॥
सहसा सादिनस्तत्र तोमरेण महामृधे । भूमावमृद्नन् वेगेन सचर्माणं पदातिनम् ॥ ३३ ॥ उस महासमरमें कितने ही हाथीसवार सहसा तोमरका प्रहार करके ढालसहित पैदल योद्धाको गिराकर उसे वेगपूर्वक धरतीपर रौंद डालते थे ॥ ३३ ॥
तथा सावरणान् कांश्चित्तत्र तत्र विशाम्पते । रथान् नागाः समासाद्य परिगृह्य च मारिष ॥ ३४ ॥ व्याक्षिपन् सहसा तत्र घोररूपे भयानके । नाराचैर्निहताश्चापि गजाः पेतुर्महाबलाः ॥ ३५ ॥ पर्वतस्येव शिखरं वज्ररुग्णं महीतले । माननीय नरेश! उस घोर एवं भयानक युद्धमें कितने ही हाथी निकट आकर अपनी सूँड़ोंसे कुछ आवरणयुक्त रथोंको पकड़ लेते और उन्हें वेगपूर्वक खींचकर सहसा दूर फेंक देते थे। फिर वे महाबली हाथी भी नाराचोंसे मारे जाकर वज्रके तोड़े हुए पर्वत-शिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ३४-३५ १/२ ॥
योधा योधान् समासाद्य मुष्टिभिर्व्यहनन् युधि ॥ ३६ ॥ केशेष्वन्योन्यमाक्षिप्य चिक्षिपुर्बिभिदुश्च ह । बहुत-से पैदल योद्धा दूसरे योद्धाओंको निकट पाकर युद्धस्थलमें उनपर मुक्कोंसे प्रहार करने लगते थे। कितने ही एक-दूसरेकी चुटिया पकड़कर परस्पर झटकते-फेंकते और एक-दूसरेको घायल करते थे ॥ ३६ १/२ ॥
उद्यम्य च भुजावन्यो निक्षिप्य च महीतले ॥ ३७ ॥ पदा चोरः समाक्रम्य स्फुरतोऽपाहरच्छिरः । दूसरा योद्धा अपनी दोनों भुजाओंको उठाकर उनके द्वारा शत्रुको पृथ्वीपर पटक देता और एक पैरसे उसकी छातीको दबाकर उसके छटपटाते रहनेपर भी उसका सिर काट लेता था ॥ ३७ १/२ ॥
पततश्चापरो राजन् विजहारासिना शिरः ॥ ३८ ॥ जीवतश्च तथैवान्यः शस्त्रं काये न्यमज्जयत् । राजन्! दूसरा सैनिक किसी गिरते हुए योद्धाका सिर अपनी तलवारसे काट लेता था और कोई जीवित शत्रुके ही शरीरमें अपना शस्त्र घुसेड़ देता था ॥ ३८ १/२ ॥
मुष्टियुद्धं महच्चासीद् योधानां तत्र भारत ॥ ३९ ॥