महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1770, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! टूटे हुए रथों, धराशायी हुए हाथियों, मरकर गिरे हुए घोड़ों और गिराये गये पैदल सैनिकोंसे क्षणभरमें यह पृथ्वी ऐसी हो गयी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया ॥ ४६-४७ ॥
क्षणेनासीन्महीपाल क्षतजैघिप्रवर्तिनी ।
पञ्चालानहनत् कर्णस्त्रिगर्तांश्च धनंजयः ॥ ४८ ॥
भूपाल! क्षणभरमें वहाँ भूतलपर खूनकी नदी बह चली। कर्णने पंचालोंका और अर्जुनने त्रिगर्तोंका संहार कर डाला ॥ ४८ ॥
भीमसेनः कुरून् राजन् हस्त्यनीकं च सर्वशः ।
एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः ।
अपराह्ने गते सूर्ये काङ्क्षतां विपुलं यशः ॥ ४९ ॥
राजन्! भीमसेनने कौरवों तथा आपकी गजसेनाको सर्वथा नष्ट कर दिया। इस प्रकार सूर्यदेवके अपराह्नकालमें जाते-जाते कौरव और पाण्डव दोनों सेनाओंमें महान् यशकी अभिलाषा रखनेवाले वीरोंका यह विनाश-कार्य सम्पन्न हुआ ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुल-युद्धविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥